शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

*(“पंचमोल्लास” १६/१८)*


 
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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“पंचमोल्लास” १६/१८)*
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*गण, गंधर्व, रिषि मुनि सब ही,*
*हमारी कला टलै नहीं कबही ।*
*सुर-नर-नाग लोक में पासी,*
*छोडें नाहीं कहां अब जासी ॥१६॥*
देव गण गन्धर्व ॠषि मुनि इन सब पर हमारी जंत्र मंत्र की कला का प्रभाव टल नहीं सकता । हमारी कला का प्रभाव सुर-नर-नाग लोक में भी चलता है तो हम उनको छोडे़ंगे नहीं और वे अब इन लोकों के अतिरिक्त कहां जावेंगे ॥१६॥
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*जप-तप करणी करैं अनेका,*
*हमसों नांहि वचे सो एका ।*
*शिवनी खिवनी चली है दोइ,*
*पंखी रूप उभै सु होई ॥१७॥*
जप तप यज्ञादि क्रिया करने वाले अनेक हैं किन्तु हमसे उनमें से एक भी नहीं बचा अर्थात् वह हमारी विद्या के प्रभाव में आ गया शिवनी खिवनी नामक दोनों दूतियां संतों की तरम चली और दोनों ने पक्षी का रूप धारण कर लिया ॥१७॥
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*दोनो ने पंछी का रूप बनाया*
*बैठी जाइ वृक्ष के मांही,*
*करै किलोल सु हरिजन तांहीं ।*
*अर्ध निसि आगे अर्ध निसि पिच्छे,*
*इस्त्री रूप बनीं पुनि इच्छै ॥१८॥*
पक्षी रूप बना दोनों वृक्ष में बैठ गई और हरिजनों संतों को रिझाने के लिये अनेक प्रकार से कलोल करने लगी । अर्ध रात्रि के पूर्व में और अर्ध रात्रि के पश्‍चात् अपनी इच्छानुसार स्त्री का रूप धारण कर लेती ॥१८॥
(क्रमशः)

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