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*संग तुम्हारे सब ही लागे, योग यज्ञ जे कीजे ।*
*साधन सकल येही सब मेरे, संग आपनो दीजैं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३०९)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*लक्ष्मी*
*नमो लक्ष१ लक्ष्मी पलोटे प्रभुजी के पग,*
*रात दिन एक टक भक्तन की आदि है ।*
*रहै डर सहित कहत नमो नमो देव,*
*अलख अभेव२ तब देत ताको दादि३ है ॥*
*जत बिन सत बिन दया बिन दत्त४ बिन,*
*जीवन जनम जगदीश बिन बादि५ है ।*
*राघो कहै रामजी के निकट रहत नित्य,*
*आदि माया ऊँकार सहज समाधि है ॥४५॥*
लक्ष्मीजी के उद्देश्य१ तथा लक्ष्मीजी को नमस्कार है । वे रात दिन निरंतर निर्निमेष प्रभु का दर्शन करते हुये प्रभु के चरणों की सेवा में लगी रहती हैं और भक्तों की आदि हैं अर्थात् प्रथम भक्त हैं । जो भय से मुक्त रहता है और देवाधि देव प्रभु को बारंबार नमस्कार करता है तब ही लेख बद्ध न होने वाले अद्वैत२ परमात्मा उस भक्त को न्याय३ प्रदान करते हैं वा उस की प्रशंसा३ करते हैं ।
जत, सत, दया, दान४ और जगदीश्वर की भक्ति बिना मानव जन्म और जीवन व्यर्थ५ ही जाता है किन्तु लक्ष्मीजी उक्त तथा अन्य सभी शुभ गुण और भगवद् भक्ति से संपन्न हैं । नित्य भगवान् के पास ही रहती हैं । आप आदि माया, ओंकार और सहज समाधि रूप हैं ।
(क्रमशः)

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