रविवार, 4 अक्टूबर 2020

*नमो ऋषि कर्दम देहुति जननि को ढोक*

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*मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥*
*हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन ।*
*उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३७२)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*कपिल मुनि* 
*जलहरन-*
*नमो ऋषि कर्दम देहुति जननि को ढोक१,*
*तारक त्रिलोक जिन जायो है कपिल मुनि ।*
*काम जित क्रोध जित लोभ जित मोह जित,*
*तपो धन योग वित२ माता उपदेशी उनि ॥*
*शील को सु कल्पवृक्ष हरत विषै की ताप,*
*ब्रह्म की मूरति आप अंतरि अखंड धुनि ।*
*राघो उनमनि३ परं तत्व मिल एक भये,*
*तावत उत्तम कृत कीन्हें यौं मुनीन्द्र पुनि ॥४०॥*
जिनने त्रिलोकी का उद्धार करने वाले कपिल मुनि को जन्म दिया था उन कर्दम ऋषि और माता देवहूति को मैं नमस्कार१ करता हूँ । कपिल मुनि काम, क्रोध, लोभ और मोह को जीतने वाले थे, तप ही उनका धन था, योग के ज्ञाता२ थे, अपनी माता को उन्हीं ने उपदेश दिया था ।
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ब्रह्मचर्य वा शील स्वभाव के तो मानों सुन्दर कल्पतरु ही थे । प्राणियों की विषय जन्य ताप को वैराग्य के उपदेश द्वारा हरते रहते थे । आपके हृदय के भीतर अखंड ब्रह्म चिन्तन रूप ध्वनि होती रहती थी, आप ब्रह्म की तो मानों मूर्ति ही थे । और मुनीन्द्र कपिलदेवजी जब तक समाधि३ द्वारा परम तत्व में मिलकर एक नहीं हुये थे तब तक श्रेष्ठ मुनियों के समान उत्तम कार्य करते ही रहे थे ।
(क्रमशः)

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