रविवार, 4 अक्टूबर 2020

*७. हैरान कौ अंग ~ ७३/७६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ ७३/७६*
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आदि अंत मधि कोई न जांणै, ना तिंहि उतपति भेख ।
कहि जगजीवन अगम है, अविगत अकल अलेख ॥७३॥
आदि अंत मध्य में कोइ प्रभु की उत्पत्ति व भेष के बारे में नहीं जानते संत कहते हैं कि प्रभु पहुंच से परे हैं जाने नहीं जा सकते वे सभी कला से परे अलिखित हैं ।
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उतपति नहिं आकार नहिं, आदि अंत पुनि नांहि ।
कहि जगजीवन सहज है, यूं परि नहीं जे नांहि ॥७४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा का कोइ आकार नहीं है कोइ निश्चित आरम्भ व अंत नहीं है वे सहज हैं वे दूर भी नहीं हैं ।
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मूरति अनंत, अनंत गति, अनंत लोक विसतार । 
कहि जगजीवन रांमजी, अनंत लहै को पार ॥७५॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की छवि अनंत है व गति भी अनंत है । व अनंतलोक तक विस्तार है संत कहते हैं कि उन अनंत का पार कोइ नहीं पा सकता ।
मूरति एक अनेक छंद, वो ओंकार विसतार ।
कहि जगजीवन सहज हरि, सुंनि आकार करतार ॥७६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक परमात्मा का वैभव अनेक छंदो में भी नहीं किया जा सकता है वो औंकार में समाहित है । संत कहते हैं कि प्रभु सहज हैं और शून्य उन प्रभु का आकार है ।
(क्रमशः)

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