बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

(“पंचमोल्लास” २५/२७)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” २५/२७)
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*कहै धराज्यू द्वै कर जोरी,*
*सुनो अर्ज इक हितकर मोरी ।* 
*निश्‍चै कीजै इनको काजू,*
*कर्म रहित सौ करो निवाजू ॥२५॥* 
राजा धराज्यू ने दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि मेरी हितकारी प्रार्थना सुनो । इन दूतियों का निश्‍चय ही कल्याण करिये निष्काम साधना में इनके मन को लगाकर इन का कल्याण कीजिये ॥२५॥ 
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*संतों ने दासियों का अंगपलट कर पुरुष बना दिया*
*तबै राव की मांनी अरजू,*
*कृपा कीन्ही हरिजन हरिजू ।* 
*ललना पलटि पुरुष भयो अंग,*
*नख सिख लाग्यो हरि को रंग ॥२६॥* 
तब संतों ने राव की प्रार्थना मानकर हरि के जनों ने उन दूतियों पर कृपा की और उनको स्त्री रूप से बदल कर पुरूष के रूप में बना दिया और उनको सम्पूर्ण रूप से हरि के रंग में भक्ति में रंग दिया ॥२६॥ 
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*सकल सोंज भई निर्मल सारु,*
*पीयो हरिरस श्रवण दारू ।* 
*कर्ण वृति करि खुले कपाटू,*
*निहचै गही ब्रह्म की बाटू ॥२७॥* 
संतों के उपदेश व कृपा से उनका अन्त: करण निर्मल राग द्वेषादि से रहित हो गया और उन्होंने श्रवणों के द्वारा हरि रस का पान किया । कर्ण वृति के द्वारा उनके ब्रह्म रंध्र के कपाट खुल गये और दूतियों ने ब्रह्म प्राप्ति का रास्ता प्राप्त कर लिया ॥२७॥ 
(क्रमशः)

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