🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*दादू काल हमारा कर गहै, दिन दिन खैंचत जाइ ।*
*अजहुं जीव जागै नहीं, सोवत गई बिहाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ काल का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *मनुज देह*
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चार मनुष्यों ने एक कोठी किराये पर ली, कोठी वालों की शर्त थी कि जब चाहूं तब खाली करा लूंगा । एक ने अपना सब कुछ समान ला डाला । एक ने खाने पीने का ही काम रखा । तीसरे ने सोने आदि के बिस्तर रखे । चौथा उसमें आराम तो करता था किन्तु रखता कुछ न था । कोठी वाले ने एक दिन सहसा खाली करा ली, जिसका जितना सामान उसमें था उतना ही उसे दु:ख हुआ और जिसका कुछ न था वह सहर्ष निकल गया । इसी प्रकार मनुज देह में पांमर, विषयी, जिज्ञासु और ज्ञानी रहते हैं। काल सहसा खाली करवाता है, तब अन्य को दु:ख होता है ज्ञानी को नहीं।
कर्त्तव्य को पूरा करे, हर्षेगा नर सोय ।
कोठी तजते तीन को, दुख इक हर्षित होय ॥९३॥

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