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*तूँ है तैसा प्रकाश कर, अपना आप दिखाइ ।*
*दादू को दीदार दे, बलि जाऊँ विलंब न लाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ५४*
*दक्षिणेश्वर में राम आदि भक्तों के साथ*
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श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ बैठे हैं । राखाल, मास्टर, राम, हाजरा आदि भक्तगण उपस्थित हैं । हाजरा महाशय बाहर के बरामदे में बैठे हैं । आज रविवार, २३ सितम्बर १८८३, भाद्रपदी कृष्ण सप्तमी है ।
नित्यगोपाल, तारक आदि भक्तगण राम के घर पर रहते हैं । उन्होंने उन्हेंआदर-सत्कार के साथ रखा है ।
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राखाल बीच बीच में अधर सेन के मकान पर जाया करते हैं । नित्यगोपाल सदा ही भाव में विभोर रहते हैं । तारक की भी स्थिति अन्तर्मुखी है । आजकल वे लोगों से विशेष वार्तालाप नहीं करते ।
श्रीरामकृष्ण अब नरेन्द्र की बात कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(एक भक्त के प्रति)- आजकल नरेन्द्र तुम्हें भी ‘लाईक’(like-पसन्द) नहीं करता । (मास्टर के प्रति) अधर के घर पर नरेन्द्र नहीं आया ?
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“एक साथ ही नरेन्द्र में कितने गुण हैं । गाने-बजाने में, लिखने-पढ़ने में, सभी में प्रवीण है । उस दिन यहाँ से कप्तान की गाड़ी से जा रहा था । गाड़ी में कप्तान भी बैठे थे । उन्होंने उससे अपने पास बैठने के लिए कितना कहा । पर नरेन्द्र अलग ही जाकर बैठा; कप्तान की ओर ताककर देखा तक नहीं ।
“केवल पाण्डित्य से क्या होगा? साधन-भजन चाहिए, इन्देश का गौरी पण्डित विद्वान था और साधक भी । शक्ति-साधक । माँ के भाव में कभी कभी पागल हो जाता था । बीच बीच में कह उठता था, ‘हा रे रे रे, निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ।’ उस समय सब पण्डित निष्प्रभ हो जाते थे । मैं भी भावाविष्ट हो जाता था । मेरा भोजन देखकर पूछता, ‘तुमने भैरवी लेकर साधना की है ?’
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“एक कर्ताभजा सम्प्रदाय के पण्डित ने निराकार की व्याख्या करते हुए कहा, ‘निराकार अर्थात् नीर का आकार !’ यह व्याख्या सुनकर गौरी बहुत क्रुद्ध हुआ ।
“पहले-पहल कट्टर शाक्त था; तुलसी का पत्ता दो लकड़ियों के सहारे उठाता था – छूता न था ! (सभी हँसे ।) इसके बाद घर गया । घर से लौट आने के पश्चात् फिर वैसा नहीं करता था ।
“मैंने कालीमन्दिर के सामने एक तुलसी का पौधा लगाया था । पर कुछ समय में वह सूख गया । कहते हैं, जहाँ पर बकरों की बलि होती है, वहाँ पर तुलसी नहीं रहती ।”
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“गौरी सभी बातों की सुन्दर व्याख्या करता था । रावण के दस शिरों के बारे में कहता था, दस इन्द्रियाँ ! तमोगुण को कुम्भकर्ण, रजोगुण को रावण और सतोगुण को विभीषण कहता था । इसीलिए विभीषण ने राम को प्राप्त किया था ।”
श्रीरामकृष्ण मध्यान्ह के भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं । कलकत्ते से राम, तारक (शिवानन्द) आदि भक्तगण आकर उपस्थित हुए । श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर वे जमीन पर बैठ गए । मास्टर भी जमीन पर बैठे हैं । राम कह रहे हैं, ‘हम लोग मृदंग बजाना सीख रहे हैं ।”
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श्रीरामकृष्ण(राम के प्रति)- नित्यगोपाल ने भी कुछ सीखा है ?
राम- जी नहीं, वह कुछ ऐसा ही मामूली बजा सकता है ।
श्रीरामकृष्ण- और तारक ?
राम- वह अच्छा बजा सकेगा ।
श्रीरामकृष्ण- तो फिर वह मुँह उतना नीचा किए न रहेगा । किसी दूसरी ओर मन अधिक लगा देने पर फिर ईश्वर पर उतना नहीं रह जाता ।
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राम- मैं समझता हूँ, मैं जो सीख रहा हूँ, वह केवल संकीर्तन के लिए है ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर के प्रति)- सुना है तुमने गाना सीखा है ?
मास्टर(हँसकर)- जी नहीं, यों ही ऊँ आँ करता हूँ ।
श्रीरामकृष्ण- तुम वह गाना जानते हो ? जानते हो ? जानते हो तो गाओ न । ‘आर काज नाइ ज्ञानविचारे, दे माँ पागल करे ।’*
(*‘अब मुझे ज्ञान-विचार स एकं नहीं है, हे माँ, मुझे तू पागल बना दे ।’)
देखो, यही मेरा असली भाव है ।”
(क्रमशः)

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