गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

(“पंचमोल्लास” २८/३०)


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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” २८/३०)
*नख सिख सकल भई सब सोंज,*
*मनसा गाई करे अति मोज ।* 
*गुरु कृपा सों भई जू भेंटू,*
*पहुंचे जाई ब्रह्म के थेटू ॥२८॥* 
नख से लेकर सिर तक हरि रस पान से उनका शरीर व अन्त: करण निर्मल होकर पवित्र हो गया और मनसा जाप के द्वारा हरि का गुण गान कर रहे है । गुरु कृपा से उनका ब्रह्म से साक्षात्कार हो गया और वे ब्रह्म स्थान में पहुंचे ॥२८॥ 
*अंतर जांमी हृदय विराजै,*
*सकल साल गुण उरके भाजे ।* 
*कथा कीर्तन सुमिरण सेवा,*
*अखंडित जपै निरंजन देवा ॥२९॥* 
गुरु कृपा से उनके हृदय में निरंजन राम का आवास हो गया और उनके हृदय को सारे कष्ट देने वाले रज तमादि गुण हृदय से निकल गये । वे सदा हरि कीर्तन कथा स्मरण, सेवा आदि में मग्न हो गये । निरंजन राम का अखण्ड जाप करने लगे ॥२९॥ 
*उपजी अन भै निर्मल सारू,*
*मिले आई निरंजन निरकारू ।* 
*विलास करे ब्रह्म के मांहि,*
*कालकर्म तहां दंड नांही ॥३०॥* 
उनके हृदय में ब्रह्म का निर्मल अनुभव उत्पन्न हो गया और वे निरंजन निराकार के साथ मिल गये तादात्मय हो गया । वे ब्रह्मानंद में विलास करने लगे जहां काल, कर्म, जन्य कोई दंड नहीं प्राप्त होता ॥३०॥ 
(क्रमशः)

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