सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*हरि भज साफिल जीवना, पर उपकार समाइ ।*
*दादू मरणा तहाँ भला, जहाँ पशु पंखी खाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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संत रज्जब जी जब १२० वर्ष की आयु के हो गये तब देह का अंत समय जानकर अपने शिष्य रामदास को साथ लेकर टौंक के वन में जाकर शिष्य को पीछे भेजकर तथा अपने शरीर को पशु पक्षियों के लिये वन में छोड़कर अपने गुरु दादूजी का परोपकार का यह उपदेश -
"(दादू मरणा तहाँ भला, जहाँ पशु पक्षी खाय ।)"
का पूरा-पूरा निर्वाह कर ब्रह्मलीन हो गये ।
संतों में उपकार की, सीमा देखी जाय ।
रज्जब ने निज देह को, छोड़ा वन में आय ॥१००॥

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