🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं,*
*तिन को निज पद परसै रे ।*
*काल न खाइ, मरै नहिं कबहूँ,*
*दादू तिनको दरशै रे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३४०)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *माया निरूपण*
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एक वृक्ष के नीचे एक पुरुष बैठा हो, वृक्ष पर से एक काला सर्प उसकी गोद में आ पड़े, अब वह पुरुष यह विचार करने लगे कि, यह सर्प किसने फेंका है या अपने आप ही गिरा है तब तक तो सर्प उसे काट लेगा और उसका विचार भी निष्फल हो जायगा । उसे तो उसी क्षण फेंक देने से ही बच सकता है विचार करने से नहीं। वैसे ही माया का तुरंत त्याग करना ही श्रेष्ठ है, विशेष विचार करना उचित नहीं ।
माया त्याग तुरंत कर, विचार कीन्हों सान ।
पड़े गोद में सर्प को, सत्वर तजा सुजान ॥२७॥

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