मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

= *कुसंग सुसंग का अंग १२७(९/१२)* =

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*बिच के सिर खाली करैं, पूरे सुख सन्तोष ।*
*दादू सुध बुध आत्मा, ताहि न दीजे दोष ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कुसंग सुसंग का अंग १२७* 
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इक औषधि मय आतमा, इक पीड़ा मय प्राण ।
रज्जब संगति कीजिये, सुख दुख शौधि१ सुजाण ॥९॥
एक प्राणी तो जीवात्मा के जन्मादि रोग को मिटाने वाला औषध रूप है और एक प्राणी जन्मादि दु:ख रूप ही है, हे सुजान ! सुख दुख का विचार१ करके सुखप्रद की संगति ही करना चाहिये ।
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सज्जन शशि संदल१ सही, संगति सुखी शरीर ।
दुर्जन कैवच२ कष्ट विष, परसत पिंड हु पीर ॥१०॥
सज्जन की संगति निश्चय ही चन्द्रमा और चन्दन१ के समान शरीर को सुखी करने वाली है और दुर्जन की संगति कष्टप्रद कौंच२ के विष के समान है, कौंच का शरीर से स्पर्श होते ही पीड़ा होती है, वैसे ही दुर्जन के संग से दु:ख होता है ।
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सज्जन सुधा सु संपती१, सकल सुखों की राशि ।
दुर्जन दुख दारुण२ दुसह, पीड़ा प्राण हुं पासि ॥११॥
सज्जन अमृत मय संपत्ति१ है, संपूर्ण सुखों की राशि है । दुर्जन भंयकर२ न सहन करने योग्य दु:ख रूप है, यदि प्राणी उसके पास जाता है तो उसे दु:ख ही होता है ।
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साधु सजीवन शब्द है, संसारी विष बात ।
रज्जब सुनिये समझ सौं, को औषधि को घात१ ॥१२॥
संत का शब्द संजीवन ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला होता है, सांसारिक प्राणियों की बात विषय विष रूप ही होती है, कौन औषधि रूप है और कौन मारक१ है यह सब जानकर विचार पूर्वक सुनना चाहिये ।
(क्रमशः)

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