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*सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव ।*
*दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*धर्मराज*
*धन्य धर्मराज कह्यो आप मत१ मूरखों से,*
*मारैंगे कपूत मम दूत संधि तोरि के ।*
*मन वच कर्म कुछ धर्म करि धीरज से,*
*राम राम राम गुन गाय सुर्ति२ डोरि३ के ॥*
*काम क्रोध लोभ मोह मारि के निशंक होय,*
*साहिब से सानुकूल राखि चित्त जोरि के ।*
*राघो कहै रवि-सुत मेटियो करम युति४,*
*रामजी मिलाओ वरदाता बंद५ छोरि६ के ॥४३॥*
धर्मराज जी को धन्यवाद है कि उनने अपने यथार्थ विचार१ बता कर मूर्ख जीवों को सचेत किया । उन्होंने कहा- यदि भगवत् भक्ति नहीं करोगे तो तुम कुपूतों को मेरे दूत ऐसे मारेंगे कि तुम्हारी सन्धियां भी तोड़ डालेंगे । अतः मन वचन और कर्म से धैर्य पूर्वक धर्म कार्य करते हुये तथा रामजी का गुणानुवाद करते हुये राम राम राम इस प्रकार प्रेम३ पूर्वक वृत्ति२ लगाकर भजन करो ।
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काम, क्रोध, लोभ और मोह को मार कर इन से निशंक बनो अर्थात् कामादि से तुम्हें पतन की शंका न रहे ऐसी स्थिति में आओ । परमात्मा के स्वरूप में चित्त वृत्ति लगाकर सदा प्रभु से सानुकूल रहो । राघवदास जी प्रार्थना करते हैं-हे वरदाता सूर्य पुत्र दयालु धर्मराजजी ! मेरे संचित कर्मों का योग४ मिटाकर अर्थात् नष्ट करके तथा अज्ञान रूप बन्धन५ से मुक्त६ करके मुझे रामजी के स्वरूपों में मिलाने की कृपा अवश्य करो ।
(क्रमशः)

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