शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

*जगन्माता के साथ वार्तालाप*

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*दादू मुझ ही मांही मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार ।*
*मुझ ही मांही मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥*
*दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार ।*
*मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ५६* 
*अधर के मकान पर दुर्गापूजा-महोत्सव में*
(१)
*जगन्माता के साथ वार्तालाप* 
श्री अधर के मकान पर नवमी-पूजा के दिन दालान में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं । सन्ध्या के बाद श्रीदुर्गामाई की आरती देख रहे हैं । अधर क्व घर पर दुर्गापूजा का महोत्सव है । इसलिए वे श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रित करके लाए हैं ।
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आज बुधवार है । १० अक्टूबर १८८३ ई. । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ पधारे हैं । उनमें बलराम के पिता तथा अधर के मित्र स्कूल-इन्स्पेक्टर सारदाबाबू भी आए हैं । अधर ने पूजा के उपलक्ष्य में पड़ोसी तथा आत्मीयजनों को भी निमन्त्रण दिया है । वे भी आए हैं ।
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श्रीरामकृष्ण सन्ध्या की आरती देखकर भावविभोर होकर पूजा के दालान में खड़े हैं । भावाविष्ट होकर माँ को गाना सुना रहे हैं ।
अधर गृही भक्त हैं । और भी अनेक गृही भक्त उपस्थित हैं । वे सब त्रितापों से तापित हैं । सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण सभी के मंगल के लिए जगन्माता की स्तुति कर रहे हैं ।
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(संगीत का भावार्थ)-“हे तारिणी ! मुझे तारो । अब की बार शीघ्र तारो । हे माँ, जीवगण यम से भयभीत हो गए हैं । हे जगज्जननि ! संसार को पालनेवाली ! लोगों को मोहनेवाली जगज्जननि ! तुमने यशोदा की कोख में जन्म लेकर हरि की लीला में सहायता की थी; तुमने वृन्दावन में राधा बन व्रजवल्लभ के साथ विहार किया । रास रचकर रसमयी तुमने रासलीला का प्रकाश किया । हे माँ, तुम गिरिजा हो, गोपतनया हो, गोविन्द की मनमोहिनी हो, तुम सद्गति देनेवाली गंगा हो । हे गौरि, सारा विश्व तुम्हारा गुणगान गाता है । हे शिवे ! हे सनातनि ! सदानन्दमयी सर्वस्वरूपिणि ! हे निर्गुणे, हे सगुणे ! हे सदाशिव की प्रिये ! तुम्हारी महिमा को कौन जानता है !”
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श्रीरामकृष्ण अधर के मकान के दुमँजले पर बैठकघर में बैठे हैं । कमरे में अनेक आमन्त्रित व्यक्ति आए हैं । बलराम के पिता और सारदाबाबू आदि पास बैठे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण अभी भी भावविभोर हैं । आमन्त्रित व्यक्तियों को सम्बोधित कर कह रहे हैं, “मैंने भोजन कर लिया है; अब तुम लोग भी भोजन करो ।” 
अधर की पूजा और नैवेद्य को माँ ने ग्रहण किया है; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण जगन्माता के आवेश में आकर कह रहे हैं, ‘मैंने खा लिया है; अब तुम लोग भी प्रसाद पाओ’?
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श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर जगन्माता से कह रहे हैं, “माँ ! मैं खाऊँ ? या तुम खाओगी ? माँ, कारणानन्दरूपिणी ।”
क्या श्रीरामकृष्ण जगन्माता को और अपने को एक ही देख रहे हैं ! जो माँ हैं, क्या वही स्वयं लोकशिक्षा के लिए पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुई हैं ? क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण भाव के आवेश में कह रहे हैं, मैंने भोजन कर लिया है ?
(क्रमशः)

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