शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - १७/२०

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - १७/२०) 
.
*दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे ।*
*बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥१७॥*
यह जीव कर्म रूपी रस्सी से बंधा हुआ है । वह रज्जु हरि के हाथ में है । जैसे भगवान् जीव को कर्मानुसार प्रेरणा करते हैं वैसा ही जीव कर्म करता है । जैसे बाजीगर बन्दर के गले में रस्सी डाल कर इधर उधर घूमाता है । वैसे ही बन्दर को चलना पड़ता है । इसी तरह जीव भी कर्मों से भ्रमता रहता है । ईश्वर तो फल देने वाला है ।
भागवत में लिखा है कि- गुणाभिमानी जीव परवश होकर सात्विक राजस तामस कर्म करके तदनुसार कभी प्रकाश बहुत लोकों को कभी दुःखमय आयास प्रधानतम शोक उत्कट मोह वाले लोकों में जन्म लेता है । वहां पर कभी स्त्री कभी पुरुष, कभी नपुंसक, बनकर अन्धा हुआ देव, मनुष्य, पशु, पक्षी योनियों में गुण कर्मानुसार सुख दुःख भोगता है । जैसे कुत्ता घर घर घूमता हुआ कर्मानुसार कर्म फलों को भोगता है । कभी कहीं दण्डाघात होता है तो कभी चावल आदि भोजन मिलता है । इसी तरह वह जीव भी कर्मानुसार ऊपर स्वर्ग में, मृत्युलोक में, अन्तरिक्ष में, ऊंच नीच कर्म फलों को भोगता हुआ सुखी दुःखी होता है ।
.
*ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा ।*
*हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥१८॥*
हे प्रभो ! आप की जैसी प्रेरणा होगी वैसा ही मैं आचरण करूँगा । आप के पास मेरा कुछ भी बल नहीं है । मैं तो आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ । 
अलवन्दारस्तोत्र में- मैं आपका ही सम्बन्धी, आपका दास, आपका ही परिचारक तथा आपकी ही शरण हूँ । इस तरह आप पर ही मेरा सारा भार है ।
.
*साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव ।*
*हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥१९॥*
इस शरीर में मेरा आत्मा आपकी आज्ञा से ही रह रहा है । जब भी आप की आज्ञा होगी तब ही यह आप का दास शरीर को त्याग कर आपके पास आ जायेगा । मैं तो आपकी दासता के बिना जीना भी नहीं चाहता । 
जैसे लिखा है कि- हे नाथ ! आपकी दासता से रहित देह प्राण सुख सब कामनायें अपनी आत्मा तथा अन्य जो कुछ भी है उसे क्षण भर भी नहीं सह सकता चाहे सैंकड़ों प्रकार से नष्ट हो जाय । मेरा यह कथन सत्य है ।
.
*॥ पति पहचान ॥*
*खंड खंड प्रकाश है, जहाँ तहाँ भरपूर ।*
*दादू कर्त्ता कर रह्या, अनहद बाजै तूर ॥२०॥*
परमात्मा का सर्व प्रकाशकत्व सामर्थ्य चराचर जगत् को प्रकाशित करता हुआ सुशोभित हो रहा है । 
श्रुति में कहा है कि- वह स्वयं प्रकाशमान है और उसी के प्रकाश से सारा विश्व प्रकाशित हो रहा है । जिस समय साधक साधना द्वारा समाधिस्थ हो जाता है । उस समय उसको अनाहत नाद सुनाई पड़ता है । उस समय साधक का चित्त परमात्मा में लीन होने से जीव ब्रह्म का अभेद हो जाता है और जीव अनन्त में डूब जाता है ।
श्रुति में कहा है कि- जैसे शुद्ध जल, जल में मिला देने से एक रूप हो जाता है इसी प्रकार हे गौतम ! जिसने उस ब्रह्म को जान लिया उसकी आत्मा ब्रह्मरूप हो जाती है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें