बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

*परमहंस-अवस्था*

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*जब लग सूता तब लग देखै, जागत भ्रम विलाना ।*
*दादू अंत इहाँ कुछ नाँहीं, है सो सोध सयाना ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३०४)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(२)
*दक्षिणेश्वर में गुरु श्रीरामकृष्ण । परमहंस-अवस्था* 
श्रीरामकृष्ण साधुओं की बात कहते हुए परमहंस की अवस्था बतलाने लगे । वही बालक की-सी चाल । मुँह पर हँसी जैसे एकदम फूट-फुटकर निकल रही है । कमर में कपड़ा नहीं, दिगम्बर; आँखें आनन्दसागर में तैरती हुई । श्रीरामकृष्ण फिर छोटे तख्त पर जा बैठे, फिर वही मन को मुग्ध कर देनेवाली बातें होने लगी ।
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श्रीरामकृष्ण(मणि से)- मैंने न्यांगटा(तोतापुरी) से वेदान्त सुना था । ‘ब्रह्म सत्य है, संसार मिथ्या है ।’ बाजीगर आकर कितने ही तमाशे दिखाता है, आम के पौधे में आम भी लग जाता है । परन्तु है यह सब तमाशा । तमाशा दिखानेवाला बाजीगर ही सत्य है ।
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मणि- जीवन जैसे एक लम्बी नींद है ! इतना ही समझता हूँ कि सब ठीक ठीक नहीं देख रहा हूँ । जिस मन से मैं आकाश को नहीं समझता, उसी मन से संसार को देख रहा हूँ न ? अतएव देखना किस तरह से ठीक होगा ?
श्रीरामकृष्ण- एक तरह और है । आकाश को हम लोग ठीक नहीं देख रहे, जान पड़ता है वह जमीन से मिला हुआ है । अतएव आदमी सत्य कैसे देखे ? भीतर विकार जो है ।
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श्रीरामकृष्ण मधुर कंठ से गाने लगे ।
(भावार्थ)- “हे शंकरि यह कैसा विकार है ? तुम्हारी कृपा-औषधि मिलने पर ही यह दूर होगा.....”
“विकार तो है ही । देखो न, संसारी जीव आपस में लड़ते हैं, परन्तु जिस आधार पर लड़ते हैं वह बेजड़ है । लड़ाई भी कैसी ! तेरा यह हो, तेरा वह हो । कितनी चिल्लाहट और गालीगलौज !”
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मणि- मैंने किशोरी से कहा था, छूँछे सन्दूक में है कुछ नहीं नहीं, परन्तु आदमी खींचातानी कर रहे हैं, रूपये हैं, यह समझकर ।
“अच्छा, यह देह ही तो कुल अनर्थों का कारण है । यही सब देखकर ज्ञानी सोचते हैं, इस गिलाफ को छोड़ें तो जी बचे ।”
श्रीरामकृष्ण- क्यों ? इस संसार को धोखे की टट्टी कहा है तो इस आनन्द की कुटिया भी तो कहा है ! देह रही भी तो क्या ? संसार आनन्द की कुटिया भी तो हो सकता है ।
(क्रमशः)

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