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*ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँहि ।*
*ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*अपलक्षण अपराध का अंग १२८*
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मकड़ी की गति माँहिं मिल, मांड्या माया जाल ।
रज्जब रूंधै सकल दिशि, माँहि मरै इस ख्याल ॥१३॥
जैसे मकड़ी अपनी भीतरी चेष्टा से ही तन्तु निकाल कर और उन्हें मिलाकर जाल बना लेती है और उसको सब और से बंध करके भीतर ही मर जाती है । वैसे ही प्राणी अपनी मनोवृति के संकल्पों से भीतर ही माया का जाल रच लेता है और सब दिशाओं से रुक कर इस माया के ध्यान में ही मर जाता है ।
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ज्यों सूवा१ शठ ज्ञान बिन, नलनी२ लटकै आप ।
त्यों रज्जब हम लटक कर, देहिं कौन शिर पाप ॥१४॥
जैसे मूर्ख शुक१ पक्षी उसे पकड़ने की नलिका२ पर नलिका धूम जाने से लटकता तो आप ही है और बिना ज्ञान मान लेता है कि मुझे किसी ने बाँध लिया, वैसे ही हम मानव गण माया को स्वयं ही पकड़ कर लटक रहे हैं, इसका दोष किसके शिर लगावें, यह तो अपना ही अपराध है ।
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मरकट१ मानी आग करि, चिरमी देख चुट२ लाल ।
त्यों रज्जब माया मनहिं, भूलि पर्या भ्रम ख्याल३ ॥१५॥
अति२ लाल चिरमी को देखकर वानरगण१ ने उसे अग्नि मानकर संग्रह किया किंतु उससे शीत कहां जा सकता है ? वह तो उसका भ्रम ही है । उनके शरीर समूह के एकत्र होने से उन्हें शीत कम लगता है । वह तो भ्रम ही भ्रम में पड़कर मन में माया को सुखद मान लिया है और उसी के चिन्तन३ में लगा रहता है किंतु उसमें सुख कहाँ है ? सुख तो मन की एकाग्रता में है, माया में एकाग्र रहने से उस एकाग्रता के द्वार आत्म सुख ही भासता है किंतु प्रमाद वश यह नहीं जानता अत: यह अपना ही अपराध है ।
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ज्यों गज मूवा ज्ञान बिन, देखि फटक१ में आप ।
त्यों रज्जब हम मरत है, देहि कौन शिर पाप२ ॥१६॥
जैसे बिल्लोर१ पत्थर की शिला में हाथी अपना प्रतिबिम्ब देख के उसे दूसरा हाथी मानकर ज्ञान न होने से शिला के दाँत मस्तक की चोटें मार मार कर मर जाता है, वैसे ही भ्रम वश हम मानव गण मरते हैं फिर मरने का दोष२ किसके शिर पर लगावें, यह तो अपना ही अपराध है ।
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यहु मन पशु पवंग१ परि२, पिशुन३ न पेखै४ नीच ।
परसै५ पावक पंचमुख६, रज्जब राता७ मीच८ ॥१७॥
जैसे नीच अश्व१ पशु अपने घातक अग्नि और सिंह को नहीं देखता४ मृत्यु८ से प्रेम करके उनके पास जाकर उनको छूता५ है तब अग्नि में पड़ कर२ जल मरता है और सिंह६ द्वारा खाया जाता है । वैसे ही दुष्ट३ मन अपनी हानि करने वालों मे ही अनुरक्त७ होता है ।
(क्रमशः)

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