शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(५/८)* =

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*बाद हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार ।*
*यहु मन सुस्थिर ना भया, जहँ दादू निज सार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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असाध्य रोग मन ऊपजै, सो गुरु शब्द न जाय ।
जन रज्जब ज्यों शंख पर, रंग न चढै चढाय ॥५॥
जैसे शंख पर रंग चढाने पर भी नहीं चढता, वैसे ही मन में जब मनमुखता दुराग्रह आदि असाध्य रोग उत्पन्न हो जाता है तब वह गुरु के शब्दों से नष्ट नहीं होता ।
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यहु मन पीड़ा गारिका, भ्रमता चक्र सु थान ।
रज्जब छेदै कौन विधि, लगे न वायक१ बान२ ॥६॥
कुम्हार के चक्र रूप स्थान पर मिट्टी का पिण्ड भ्रमण कर रहा है, वह बाण से किस प्रकार छेदा जा सकता है ? भ्रमण के वेग से उसके बाण२ लगता ही नहीं, वैसे ही इस मन में भ्रमण का वेग है अत: वह किस प्रकार विद्ध हो सकता है ? उसके वचन१ तो लगता ही नहीं ।
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नख शिख पाखर१ पहरि करि, भया वज्र व्यवहार ।
रज्जब मारै कौन विधि, कहा करै हथियार ॥७॥
हाथी नख से शिखा तक लोहे की झूल१ पहन कर व्रज के समान हो जाता है, तब उसे किस प्रकार मारैं हथियार उसका क्या करैं ? वे तो उसके लगते ही नहीं । वैसे ही मन अपने व्यवहार से व्रज के मान कठोर हो रहा है ? इसको किस प्रकार मारैं वचन तो इसके लगते ही नहीं, तब वे क्या करैं ?
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रज्जब यहु मन काछिबा, काठा१ अती कठोर ।
बाहर शिर काढै नहीं, तो मरैं किहिं ओर ॥८॥
कछुआ अति कठोर होता है, वह अपनी ढाल से बाहर शिर न निकाले तो उसके किस ओर मारैं ? वैसे ही मन अति कठोर१ है, यह व्यवहार से वृत्ति न निकले तो इसके शब्द किस ओर मारैं अर्थात व्यवहार में आसक्त मन को उपदेश नहीं लगता ।
(क्रमशः)

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