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*दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव ।*
*सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ उपजन का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*विभीषण की पद्य टीका*
*इन्दव-*
*भक्ति विभीषण कौन कहै जन,*
*जाय कही सु सुनो चित लाई ।*
*चालत झ्याज अटक्कि परी बीच,*
*मानुष एक दियो ले बहाई ॥*
*जाय लाग्यो तट राक्षस गोदन,*
*ले कर दौरि गये जित राई ।*
*देख रु कूद पर्यो सु ठर्यो जल,*
*आज हि राम मिले मनु भाई ॥२९॥*
विभीषण जी की भक्ति को पूर्ण रूप से तो कौन मनुष्य कह सकता है किन्तु जो कही जा सकती है, वह तो मैं कहता हूँ मन लगाकर सुनो-
एक व्यापारी का जहाज समुद्र में चलता हुआ अधिक वायु चलने आदि कारणों से रुक कर डूबने लगा । बचाने के बहुत यत्न किये किन्तु जब कोई भी सफल नहीं हुआ तब उसमें बैठे हुये एक पण्डित ने कहा- समुद्र को एक मानव की बलि दी जाय तो जहाज बच जायगा । व्यापारी ने जिसका कोई सहायक न था ऐसे एक मनुष्य को समुद्र में डलवा दिया तब जहाज डूबने से बच गया और समुद्र में डाला गया मनुष्य किनारे लगकर कुछ राक्षसों की दृष्टि में आ गया ।
राक्षस उसे गोद में उठाकर हर्ष से दौड़ते हुये जहां अपने राजा विभीषण थे वहां गये । विभीषण रामजी के समान आकार वाले इस मनुष्य को देखकर हर्ष के मारे सिंहासन से सहसा कूद पड़े और उनका हृदय शीतल जल के समान ठर गया अर्थात् इतना आनन्द मिला मानो आज साक्षात् भगवान् राम ही मिल गये हों ।
(क्रमशः)

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