रविवार, 11 अक्टूबर 2020

(“पंचमोल्लास” १९/२१)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” १९/२१)
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सुमरी दुर्गा, उतरी भवनूं,
संत गुफा में कियो गवनू ।
लगी समाधि उनमनी डोरी,
खुले समाधि न लागै ढोरी ॥१९॥
उन दूतियों ने दुर्गा माता का स्मरण किया और संत के भवन में उतर गई और संत की गुफा में प्रवेश किया, संतों की समाधि पर ब्रह्म के साथ उनमनी रूप से लगी हुई थी । जब तक संतों की समाधि नहीं खुले तब तक दूतियों का कोई भी उपाय प्रभावशाली नहीं हो सकता ॥१९॥
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दासी संतों के पास गई कहा हम सेवा करेंगी
ध्यान सेन में आज्ञा आई,
कहो बेगि कवन हो सांई ।
हम हैं तुम्हरे कर चरनानि दासी,
करैं सेव रहैं हम पासी ॥२०॥
संतों ने ध्यानावस्था में ही सैन ईशारे के द्वारा आज्ञा दी कि हे सांई जल्दी कहो आप कौन हैं । दूतियों ने कहा हम आपके चरणों की दासी हैं और पास रह कर सेवा करना चाहती हैं ॥२०॥
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संतों ने मक्खियां बनादी
गुप्त कला संतों विस्तारी,
मक्खी रूप भई है दासी ।
जंत्र मंत्र टरि गये सब ही,
इक अवसाण न आयो तब ही ॥२१॥
संतों ने अपनी गुप्त कला साधना का विस्तार किया ओर दोनों दूतियों को मक्खी के रूप में बना दिया । इस समय दूतियों के मंत्र तंत्र सभी बेकार हो गये और उनको अपनी कला जंत्र मंत्र दिखाने का एक भी अवसर नहीं मिला ॥२१॥
(क्रमशः)

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