शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” ७३/७५)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” ७३/७५)*
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*माता पिता नहीं कोई संगाती,*
*कुटुंब परिवार कौन को नाती ।* 
*ठौर कौन बनी है आई,*
*करी सहाई न दुर्गा माई ॥७३॥* 
उन्होने भयभीत होकर कहा अब माता-पिता संबन्धी कोई भी सहायक नहीं है, कुटुंब परिवार नाती आदि कोई भी नहीं है । यह कौनसा स्थान है कि, दुर्गामाता भी सहायता रक्षा करने नहीं आती ॥७३॥ 
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*ज्ञानदास जी ने सरीर पलटा*
*ज्ञान दास पलटयो सरीरू,*
*लांगी लाइ ज्यूं डारयो नीरू ।* 
*रांम राम निश्‍चै सो भाखे,*
*ताको राम बंधू जन राखे ॥७४॥*
ज्ञानदास ने उस समय अपने शरीर को पलट कर मानव रूप में बदल दिया और ऐसा वातावरण हो गया मानों लगी हुई आग पर पानी गिर गया हो और उन्होंने कहा जो व्यक्ति निश्‍चित रूप से मन लगा राम राम बोलेगा उसकी राम बंधू रक्षा करेंगें ॥७४॥ 
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*सवारी त्यागी*
*‘‘रांम रांम’’ सब कहै पुकारी,*
*कहे संत छाडो असवारी ।* 
*तुरंग त्यागि कीयौ प्रणामू,*
*देखत दृष्टि सरे सब कांमू ॥७५॥* 
सब ने जोर से पुकार कर राम राम कहा, संत ने कहा अब तुम अपने घोड़े छोड़ दो । सब ने घोड़ों का त्याग कर प्रणाम किया और संत की दृष्टि पड़ते ही उनके सब कार्य सिद्घ हो गये ॥७५॥ 
(क्रमशः)

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