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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*८. लै कौ अंग ~ ३७/४०*
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कहि जगजीवन साध सोइ, भगत वैषनौं दास ।
रांम कहै अरु कहावै, अकल पुरिष की प्यास६ ॥३७॥
(६. अकल पुरिष की प्यास=परम पिता परमेश्वर को प्राप्त करने की इच्छा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वह ही साधु है जो दास्य भाव रखे, प्रभु का स्मरण करे, व कराये और जिसे प्रभु मिलन की चाह हो ।
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रांम रांम रहिता कहै, कहता रहैं समाइ ।
कहि जगजीवन रांम समांनां, हरि मंहि बोलै आइ ॥३८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव जब तक रहे राम राम कहे व राम में ही समाया रहे और इस प्रकार समाये़ कि प्रभु ही स्वयं ही आकर उसे धन्य कर दें ।
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ब्रह्म अस्थल मन लीन रहै, माया बिषै उदास ।
रांम सुमिर रांमहि मिलै, सु कहि जगजीवनदास ॥३९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ब्रह्म स्थान में मन लीन रहे व माया स्थान के प्रति उदासीन रहे । राम स्मरण से राम ही मिलते हैं ।
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बात कही तौ का भया७, वस्तु न चिन्हीं जाइ ।
कहि जगजीवन बस्तु८ मंहि, मस्त रहै ल्यौ लाइ ॥४०॥
(७. का भया=क्या हुआ) (८. बस्तु=परम तत्त्व)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बात कहने से क्या सिद्ध होता है सिद्ध तो वस्तु पहचानने से होता है । और वस्तु परम तत्त्व जैसी कोइ भी नहीं है उसे पहचान कर हे जीवात्मा मस्त रह ।
(क्रमशः)

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