शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

(“पंचमोल्लास” ३४/३६)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ३४/३६)
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*क्षमावंत, निर्लोभ, मोह, आसा, तृष्णां नांहि ।* 
*पचीस प्रकीरति तीन गुण, त्यागि मिले हरि मांहि ॥३४॥* 
संत सदा क्षमावान लोभ रहित, मोह, आसा, तृष्णा आदि से रहित एंव पचीस प्रकृति पंच महाभूत एकादश इन्द्रिय पंच तन्मात्रा अष्ट प्रद्भति आदि को एवं रज तम आदि तीन गुणों को त्याग कर हरि में मिल जाते हैं ॥३४॥ 
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*कृपावंत नाहिं द्रोह कहूं, कंचन काच समान ।* 
*निंदय अस्तुति रहित है, नाहिं मान अपमान ॥३५॥* 
संत लोग कृपावान्, दयावान, एवं किसी से उनके द्रोह द्वेष नहीं है और वे कांच व कंचन स्वर्ण को एक समान मिट्टी समझते हैं वे किसी की निंदा व स्तुति नहीं करते दोनों से रहित और मान एवं अपमान को भी सदा समान समझते हैं ॥३५॥ 
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*साच सील अति सहनता, आत्मवत गंभीर ।* 
*समदृष्टि सीतल सदा, ज्ञाता बुधि गंभीर ॥३६॥* 
संत सर्वदा सत्यवादी, शील स्वभाव, सुख दु:ख मानापमान आदि को सहन करने वाले और जिस प्रकार अत्यन्त गंभीर रहता है, अर्थात् किसी भी तरह से विचलित न होता ऐसे संत भी संसारी माया से विचलित नहीं होते एवं प्राणिमात्र में समदृष्टि रखने वाले क्रोधादि भावों से रहित, ज्ञानवान् बुद्घिमान और गंभीर होते हैं ॥३६॥ 
(क्रमशः)

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