बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९१ - **समर्थ लीला** । तिलवाड़ा
ऐसो राजा सेऊं ताहि,
और अनेक सब लागे जाहि ॥टेक॥
तीन लोक ग्रह धरे रचाइ,
चँद सूर दोऊ दीपक लाइ ।
पवन बुहारे गृह अँगणाँ,
छपन कोटि जल जाके घराँ ॥१॥
राते सेवा शँकर देव,
ब्रह्म कुलाल१ न जाने भेव ।
कीरति करणाँ चारों वेद,
नेति नेति न विजाणैं भेद ॥२॥
सकल देवपति सेवा करैं,
मुनि अनेक एक चित धरैं ।
चित्र विचित्र लिखैं दरबार,
धर्मराइ ठाढ़े गुण सार ॥३॥
रिधि सिधि दासी आगे रहें,
चार पदारथ जी जी कहैं ।
सकल सिद्ध रहें ल्यौ लाइ,
सब परिपूरण ऐसो राइ ॥४॥
खलक खजीना भरे भँडार,
ता घर बरतै सब सँसार ।
पूरि दीवान सहज सब दे,
सदा निरंजन ऐसो हे ॥५॥
नारद भावे गुण गोविन्द,
करे सारदा सब ही छँद ।
नटवर नाचैं कला अनेक,
आपन देखै चरित अलेख ॥६॥
सकल साध बाजैं नीशान,
जै - जै कार न मेटै आन ।
मालिनि पुहप अठारह भार,
आपण दाता सिरजनहार ॥७॥
ऐसो राजा सोई आहि,
चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।
दादू ताकी सेवा करै,
जिन यहु रचिले अधर धरै ॥८॥
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समर्थ प्रभु की सामर्थ्य रूप लीला दिखा रहे हैं - मैं ऐसे राजा की समीपता सेवन करता हूं जिसकी सेवा में अन्य अनेक राजा लगे हैं, जिसने त्रिलोक रचे हैं और ग्रहों को रच कर यथा स्थान रक्खे हैं । सूर्य चन्द्र दो दीपक लगावे हैं । जिनके घर वायु गृहांगण को साफ करते हैं, छप्पन कोटि जलद जल भरते हैं।
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शँकरादि देवता सेवा में अनुरक्त हैं, विष्णु और प्रजापति१ शरीरों की रचना व पालन सेवा में संलग्न हैं, किन्तु वे भी प्रभु के स्वरूप रहस्य को पूर्ण रूप से नहीं जानते । ऋग्, यजु, साम और अथर्व चारों वेद यश - गान करते हैं किन्तु उनके स्वरूप रहस्य को विशेष रूप से न जानकर "यह नहीं, यह नहीं" कह के मौन हो जाते हैं ।
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सब देवताओं के स्वामी इन्द्र भी उनकी सेवा करते हैं । अनेक मुनि उन अद्वैत प्रभु में ही चित्त को लगावे रखते हैं । जिनके दरबार में चित्रगुप्त प्राणियों के पाप - पुण्य का हिसाब विचित्र ढँग से लिखते रहते हैं, श्रेष्ठ गुण वाले धर्मराज खड़े रहते हैं।
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ऋद्धि - सिद्धि दासी के समान आगे खड़ी रहती हैं । अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष, चारों पदार्थ "जी भगवन् ! जी भगवन्" करते रहते हैं । सँपूर्ण सिद्ध अपनी वृत्ति उनके स्वरूप में लगा कर रहते हैं, वे ऐसे राजा हैं।
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जो सभी कलाओं में परिपूर्ण हैं, सँसार के लिये उनने धन के कोश और वस्तुओं के भँडार भर रक्खे हैं । सब सँसार उन्हीं से लेकर सब वस्तुएं बरतता है । वे महान् प्रभु अनायास ही भक्तों की कमी पूर्ण कर देते हैं । वे ऐसा कार्य करने पर भी सदा निरंजन ही बने रहते हैं, माया – अँजन उनके नहीं लगता ।
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नारद उन गोविन्द के गुण - गान करते हैं, सब प्रकार के छँदों से सरस्वती उनकी स्तुति करती रहती है । वे नटवर अनेक कलाओं द्वारा नृत्य करते हैं और वे अलेख प्रभु अपने चरित्र को आप ही देखते हैं ।
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सँपूर्ण सँत ही उनके नगाड़े हैं, उन प्रभु की महिमा रूप ध्वनि उनसे निकलना ही उनका बजना है वो सभी सन्तों के उनकी महिमा रूप नगाड़े बजते रहते हैं, जै जै आकार वाली ध्वनि होती ही रहती है । सन्त उनकी मार्यादा नहीं मेटते।
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अठारह भार वनस्पति उनके पुष्प पहुंचाने वाली मालिनी है । वे सृष्टि - कर्ता प्रभु आप ही सबको कर्मानुसार देते रहते हैं । चौदह भुवनों में समाये हुये ऐसे जो राजा हैं, वे ही हमारे उपास्य हैं । जिनने यह सँसार रच कर अधर धर रक्खा है, हम उन्हीं प्रभु की सेवा - भक्ति करते हैं । यह पद खाटू में राव रायसिंह को कहा था । प्रसंगकथा - दृष्टि सु - सि - त - ११ - १९ में देखो ।
(क्रमशः)

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