🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*८. लै कौ अंग ~ २९/३२*
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*८. लै कौ अंग ~ २९/३२*
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सुप्रभात९ सुमिरन करै, मन राखै लै लीन ।
कहि जगजीवन तेज मंहि, मन खेलै ज्यूँ मीन ॥२९॥
{९. सुप्रभात=प्रातःकाल(ब्रह्म मुहुर्त)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभात वेला में जो स्मरण करें व मन को प्रभु की लगन में लीन रखें वह जीव प्रभु के तेजोमय प्रभा में ऐसे आनंद पूर्वक विचरण करता है जैसे जल में मछली करती है ।
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कहि जगजीवन रांम घरि, जे बरतनि जे आथि१० ।
सो ले हरि धन बरततां, ह्रिदै निरंजन साधि ॥३०॥
{१०. आथि=अस्ति (=वर्तते, है)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो राम रुपी स्मरण को ही धन मानकर व्यवहार करते हैं वे हरि धन खर्च करते समय निरंजनं देव को अपने हृदय में रखते हैं ।
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कहि जगजीवन कीनिया११, आसिक अल्लह लीन ।
कर्म कीनां अत पाक दिल, तात तबज्या१२ दीन ॥३१॥
(११. कीनिया=रसायन विद्या) {१२. तबज्या=तवज्जुह (=ध्यान देना)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दो आशिक व अल्लाह जब एक होते है तो उस रसायन से जो कर्म पवित्र मन से किया जाये उसे ही परमात्मा अपना कृत्य मानते हैं ।
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रांम रिदै लै लीन मन, जिस का घट मंहि सुद्धि१ ।
कहि जगजीवन पात्र सौ, जिस मंहि अनंत बुद्धि२ ॥३२॥
{१. घट सुद्धि=शुद्ध(स्वच्छ) अन्तःकरण} (२. अनंत बुद्धि=नाना प्रयोजनों का साधक)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस ह्रदय में राम है या जो हृदय राम में लीन है वह हृदय शुद्ध है वह ही वह योग्य पात्र है जिसमें अनंत बुद्धि समायी है ।
(क्रमशः)
कहि जगजीवन तेज मंहि, मन खेलै ज्यूँ मीन ॥२९॥
{९. सुप्रभात=प्रातःकाल(ब्रह्म मुहुर्त)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभात वेला में जो स्मरण करें व मन को प्रभु की लगन में लीन रखें वह जीव प्रभु के तेजोमय प्रभा में ऐसे आनंद पूर्वक विचरण करता है जैसे जल में मछली करती है ।
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कहि जगजीवन रांम घरि, जे बरतनि जे आथि१० ।
सो ले हरि धन बरततां, ह्रिदै निरंजन साधि ॥३०॥
{१०. आथि=अस्ति (=वर्तते, है)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो राम रुपी स्मरण को ही धन मानकर व्यवहार करते हैं वे हरि धन खर्च करते समय निरंजनं देव को अपने हृदय में रखते हैं ।
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कहि जगजीवन कीनिया११, आसिक अल्लह लीन ।
कर्म कीनां अत पाक दिल, तात तबज्या१२ दीन ॥३१॥
(११. कीनिया=रसायन विद्या) {१२. तबज्या=तवज्जुह (=ध्यान देना)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दो आशिक व अल्लाह जब एक होते है तो उस रसायन से जो कर्म पवित्र मन से किया जाये उसे ही परमात्मा अपना कृत्य मानते हैं ।
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रांम रिदै लै लीन मन, जिस का घट मंहि सुद्धि१ ।
कहि जगजीवन पात्र सौ, जिस मंहि अनंत बुद्धि२ ॥३२॥
{१. घट सुद्धि=शुद्ध(स्वच्छ) अन्तःकरण} (२. अनंत बुद्धि=नाना प्रयोजनों का साधक)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस ह्रदय में राम है या जो हृदय राम में लीन है वह हृदय शुद्ध है वह ही वह योग्य पात्र है जिसमें अनंत बुद्धि समायी है ।
(क्रमशः)

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