शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

पीव पहिचान का अंग २० - १/६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - १/६)
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*सारों के सिर देखिये, उस पर कोई नांहि ।*
*दादू ज्ञान विचार कर, सो राख्या मन मांहि ॥२॥*
जिस परमात्मा को ज्ञानी पुरुष ब्रह्मज्ञान के विचार द्वारा अपने हृदय में धारण करते हैं वे प्रभु सर्वशिरोमणि हैं । 
अर्थात् सर्वमहान् हैं, कठ में- जो परमात्मा अन्तर्यामी रूप से सब के हृदय में स्थित हैं तथा देवता मनुष्य आदि सभी प्राणियों को वश में रखता है । सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अपने एक ही रूप को अपनी लीला से अनेक प्रकार का बना लेता है उसी सर्वशक्तिसंपन्न परमात्मा को ज्ञानी पुरुष अपने अन्दर ही स्थित देखते हैं । उन्हीं को शाश्वत सुख मिलता है दूसरों को नहीं ।
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*सब लालों सिर लाल है, सब खूबों सिर खूब ।*
*सब पाकों सिर पाक है, दादू का महबूब ॥३॥*
जो प्रभु सबसे अधिक प्रियतम तथा सर्वश्रेष्ठ सर्वपवित्र है, वह मेरा मित्र है । आत्मा ही सर्वप्रिय है । वह सब भूतों का मित्र है । पवित्र करनेवालों में पवित्र है ।
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*परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् ।*
*निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वंदनम् ॥४॥*
*एक तत्त्व ता ऊपर इतनी, तीन लोक ब्रह्मंडा ।*
*धरती गगन पवन अरु पानी,*
*सप्त द्वीप नौ खंडा ॥५॥*
*चंद सूर चौरासी लख, दिन अरु रैणी,*
*रच ले सप्त समंदा ।*
*सवा लाख मेरु गिरि पर्वत,*
*अठारह भार, तीर्थ व्रत ता ऊपर मंडा ।*
*चौदह लोक रहैं सब रचना,*
*दादू दास तास घर बंदा ॥६॥*
जिस ब्रह्म से आकाश, वायु, अग्नि, जल, तथा जम्बू प्लक्ष, कुश, शाल्मलि, क्रौंच, शाक, पुष्कर ये सातों द्वीप पैदा हुए । उत्कल, हिरण्य, भद्राश्व, केतुमाल, इलावृत, नाभि, किंपुरुष, भरत, नरहरि ये नौ खण्ड पैदा हुए । स्वर्ग मर्त्य पाताल ये तीनों लोक उत्पन्न हुए, जिनके आश्रित प्राणी रहते हैं । सूर्य चन्द्रमा चौरासी लाख योनि दिन रात तथा सात समुद्र सवा लाख पर्वत अठारह भार वनस्पतियों का तथा तीर्थव्रतादिकों का रचयिता । सुतलादि सात ऊपर के अतलादि सात नीचे के जिस प्रभु ने रचे हैं तथा उसी के आश्रित यह सब रहते हैं, हम उसी प्रभु के दास हैं । 
भागवत में- अनन्त प्रभावशाली अनन्त गुणवीर्यधर्म वाला जो सर्वत्र स्वतन्त्र पृथ्वी के नीचे पाताल में स्थित रहकर अनायास ही इस पृथ्वी को धारण करता हुआ विश्व को पालता है ।
उसी परमेश्वर से ही वसु रुद्र अनेक देवता उत्पन्न हुए हैं । उन्हीं से साध्य गण नाना मनुष्य विभिन्न जाति वाले पशु, पक्षी, प्राण, अपान, वायु, धान जौ गेहूं आदि अन्न तथा तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य यज्ञ आदि के अनुष्ठान की विधि से सबके सब उत्पन्न हुए हैं ।
उसी से सात प्राण अग्नि की काल कराली सात लपटें, सात विषयरूपी समिधाएँ, सात प्रकार के होम, सात लोक, इन्द्रियों के सप्त छिद्र उत्पन्न होते हैं, जिनमें प्राण विचरते हैं । हृदय रूपी गुहा में सात, सात के समुदाय उसी के द्वारा प्राणियों में स्थापित किये हैं । सात समुद्र पर्वत अनेक रूपों वाली नदियाँ बहती हैं । इससे परिपुष्ट हुए शरीर से अन्तरात्मा परमेश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित रहते हैं ।
(क्रमशः)

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