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*दादू निर्विकार निज नांव ले, जीवन इहै उपाय ।*
*दादू कृत्रिम् काल है, ताके निकट न जाय ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*आय गयो जब काल महाबल,*
*मोह जँजाल पर्यो जम आये ।*
*नाम नरायण पुत्र लियो डरि,*
*आरतिवंत सु बैन सुनाये ॥*
*देव सुन्यो स्वर दौरि परे,*
*जमदूतन को हरि धर्म बताये ॥*
*हारि गये तव ताड़ित१ दिये,*
*ध्रम२ ने भट आपन हूं समझाये ॥२६॥*
जब महा बलवान् काल का समय आया अर्थात् मृत्यु का समय आ गया तब स्त्री, पुत्रादि के स्नेह रूप मोह जाल में फँसे हुये उस अजामिल को लेने के लिये महाभयानक यमदूत हाथों में मुद्गर और फाँसी लिए उसके पास आ खड़े हुए । उनको देखकर तथा अत्यन्त भय से व्याकुल होकर रक्षा के लिये आर्त स्वर से अपने पुत्र नारायण का नाम उच्च स्वर से बोला ।
उसी समय आकाश मार्ग से कहीं जाते हुये भगवान् के पार्षदों ने वह सुना और नारायण भगवान् का नाम बोलने वाले को कौन दुःख दे रहा है, यह विचार कर रक्षार्थ दौड़कर वहां आ पहुँचे और यमदूतों से कहा- इस भक्त को क्यों सता रहे हैं? यमदूतों ने उसके पूर्व दुष्कर्म सुनाकर कहा- “यह भक्त नहीं है ।” पार्षद- ‘इसने अन्त समय भगवान् नारायण का नाम बोला है, इससे इसके सब पाप नष्ट हो गये, नाम का माहात्म्य ऐसा ही है ।’ इस प्रकार भागवत धर्म और हरि महिमा सुनाने पर यमदूत हार गये तब उनको वहां से भगा१ दिया । यमदूतों ने जाकर उक्त घटना धर्मराज२ को सुनाई तब उनने अपने दूतों को समझाते हुये कहा-भगवान् का नाम बोलने वालों के पास तुम मत जाया करो ।
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२६ वें इन्दव के आगे माधवदास जी के पांच इन्दव और किसी किसी पुस्तक में हैं सो यहां दिये जा रहे हैं-
इन्दव-
द्विज एक अजामिल अन्त समै,
जम के जम दूतन आन गह्यो ।
भय भीत महा अति आतुर हो,
सुत हेत नरायन नाम लह्यो ॥
जब संतन आय सहाय करी,
गहि बेत सौं दूत को देह दह्यो ।
‘माधोदास’ कहै प्रभु पूरण है,
हरि के सुमरे अघ नांहिं रह्यो ॥१॥
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जमदूत भजे जम लोक गये,
जमराज सौं जाय पुकार करी ।
जहां अंग के भंग दिखाय दियो,
तहँ त्रास की पास उतार धरी ॥
करता हम और न जानत हैं,
हम पै अब होत न एक घरी ।
‘माधोदास’ कहै अघ मेटत हैं,
सोई दीन अधीर न संत हरी ॥२॥
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जमराज कहै जम दूतन सौं,
तुम बात भली सुनलो अब ही ।
जहँ भक्त के भेष की बात सुनो,
वह मारग जाहु मतै कब ही ॥
हरि के जन सौं कोई कोप करे,
हरि देत सजा तिहिं को तब ही ।
‘माधोदास’ की आश विश्वास यह,
हरि राय की टेक सदा निबही ॥३॥
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जमदूत कहै जमरायन सौं,
तुम्ह काहे को बीच करावत हांसी ।
इत तैं पठवो उत वे न गिनें,
हरि के जन बीच हि मार भगासी ॥
पशु मानुष पंखि की कौन चले,
तहां कीट पतंग सबै जु मैवासी ।
‘माधोदास’ नरायन नाम प्रताप सौं,
पाप जरे जैसे फूस की रासी ॥४॥
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डरे धर्मराय उठे अकुलाय,
रहे जु खिसाइ रु बात चलाई ।
नाम उचार भयो तिहिं बार,
सहि शिर मारग एक न धाई ॥
सुनहु जमदूत कु जान कुपूत,
भई भल सूत बचे हम भाई ।
जहँ काल प्रचण्ड को डण्ड मिट्यो,
हमरी तुमरी किन बात चलाई ॥५॥
(क्रमशः)

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