शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

*साधु का हृदय*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🌷 #श्रीरामकृष्ण०वचनामृत 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*कबहुँ न बिहड़ै सो भला, साधु दिढ मति होइ ।*
*दादू हीरा एक रस, बाँध गाँठड़ी सोइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)
================
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
परिच्छेद ५३ 
*अधर के मकान पर ईशान आदि भक्तों के संग में* 
(१)
*बालक का विश्वास । अछूत जाति और शंकराचार्य ।*
*साधु का हृदय* 
श्रीरामकृष्ण ने कलकत्ते में अधर के मकान पर शुभागमन किया है । आप अधर के बैठकघर में बैठे हैं । दिन के तीसरे पहर का समय है । राखाल, अधर, मास्टर, ईशान आदि तथा अनेक पड़ोसी भी उपस्थित हैं ।
.
श्री ईशानचन्द्र मुखोपाध्याय को श्रीरामकृष्ण प्यार करते थे । वे अकाउण्टेण्ट जनरल के आफिस में सुपरिण्टेण्डेण्ट थे । पेन्शन लेने के बाद वे दान-ध्यान, धर्म-कर्म करते रहते और बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते थे । मछुआबाजार स्ट्रीट में उनके मकान पर श्रीरामकृष्ण ने एक दिन आकर नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ भोजन किया था और लगभग पूरे दिन रहे थे । उस उपलक्ष्य में ईशान ने अनेक लोगों को भी आमन्त्रित किया था ।
.
श्री नरेन्द्र आनेवाले थे, परन्तु आ न सके । ईशान पेन्शन लेने के बाद श्रीरामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर में सर्वदा जाया करते हैं, और भाटपाड़ा में गंगातट पर निर्जन में बीच बीच में ईश्वरचिन्तन करते हैं । इस समय उनके मन में भाटपाड़ा में गायत्री का पुरश्चरण करने की इच्छा थी । आज शनिवार, २२ सितम्बर १८८३ ई. है ।
.
श्रीरामकृष्ण(ईशान के प्रति)- अपनी वह कहानी कहो तो – बालक ने पत्र भेजा था ।
ईशान(हँसकर)- एक बालक ने सुना कि ईश्वर ने हमें पैदा किया है । इसलिए उसने अपनी प्रार्थना जताने के लिए ईश्वर के नाम पर एक पत्र लिखकर लेटर बाक्स में डाल दिया । पता लिखा था – स्वर्ग ! (सब हँसे ।)
.
श्रीरामकृष्ण(हँसते हुए)- देखा, इसी बालक की तरह विश्वास चाहिए ।* तब होता है । (ईशान के प्रति) और वह कर्मत्याग की कहानी सुनाओ तो । 
(* “The kingdom of heaven unto babes but is hidden from the wise and the pruden.” – Bible)
ईशान- भगवान् की प्राप्ति होने पर सन्ध्या आदि कर्मों का त्याग हो जाता है । गंगा के तट पर सभी सन्ध्योपासना करने की मनाई है । मृताशौच तथा जन्मशौच, दोनों ही हुए हैं । अविद्यारूपी माता की मृत्यु हुई है और आत्माराम का जन्म हुआ है ।”# 
(#मृता मोहमयी माता जातो बोधमयः सुतः । 
सूतकद्वयसम्प्रातौ कथं सन्ध्यामुपास्महे ॥ 
हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति । 
नास्तमेति न चोदेति कथं सन्ध्यामुपास्महे ॥ 
- मैत्रैयी उपनिषद् २/१३, १४) 
.
श्रीरामकृष्ण- अच्छा वह कहानी सुनाना, - जिसमें कहा है कि आत्मज्ञान होने पर जातिभेद नहीं रह जाता ।
ईशान- वाराणसी में गंगास्नान करके शंकराचार्य घाट की सीढ़ी पर चढ़ रहे थे – उस समय कुत्ते पालनेवाले एक चाण्डाल को सामने बिलकुल पास ही देखकर बोले, “यह क्या, तूने मुझे छू लिया !” चाण्डाल बोला, “महाराज, तुमने भी मुझे नहीं छुआ और मैंने भी तुम्हें नहीं छुआ । आत्मा सभी के अन्तर्यामी और निर्लिप्त हैं । शराब में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब और गंगाजल में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब, क्या इन दोनों में भेद है ?
.
श्रीरामकृष्ण(हँसकर)- और वह समन्वय की कथा कैसी ? सभी मतों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है ।
ईशान(हँसकर)- हरि और हर में एक ही धातु ‘ह’ है । केवल प्रत्यय का भेद है । जो हरि हैं, वही हर हैं । विश्वास भर रहना चाहिए ।
श्रीरामकृष्ण(हँसकर) अच्छा वह कहानी – साधु का हृदय सब से बड़ा है ।
ईशान(हँसकर)- सब से बड़ी है पृथ्वी, उससे बड़ा है समुद्र, उससे बड़ा है आकाश । परन्तु भगवान् विष्णु ने एक पैर से स्वर्ग, मर्त्य, पाताल – त्रिभुवन पर अधिकार कर लिया था । पर उस विष्णु का पद साधु के हृदय में है ! इसलिए साधु का हृदय सब से बड़ा है । इन सब बातों को सुनकर भक्तगण आनन्दित हो रहे हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें