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*सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।*
*दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥*
(श्री दादूवाणी ~ साक्षीभूत का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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“उन्हें क्या समझा जा सकता है ? इसीलिए मेरा बिल्ली के बच्चे का-सा भाव है । माँ जहाँ भी रख दे, मैं कुछ नहीं जानता । छोटे बच्चे नहीं जानते, माँ का कितना ऐश्वर्य है !”
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के चबूतरे पर बैठे स्तुति कर रहे हैं, - ओ माँ ! ओ माँ ओंकाररूपिणि ! माँ ! ये लोग कितना सब वर्णन करते हैं, माँ ! – कुछ समझ नहीं सकता ! कुछ नहीं जानता हूँ, माँ ! शरणागत ! शरणागत ! केवल यही करो माँ ! जिससे तुम्हारे श्रीचरणकमलों में शुद्धा भक्ति हो ! अब और अपनी भुवनमोहिनी माया में मोहित न करो माँ ! शरणागत ! शरणागत !”
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मन्दिर में आरती हो गयी । श्रीरामकृष्ण कमरे में छोटे तख्त पर बैठे हैं । महेन्द्र जमीन पर बैठे हैं ।
महेन्द्र पहले-पहल श्री केशव सेन के ब्राह्मसमाज में हमेशा जायाका दर्शन करने के बाद करते थे । श्रीरामकृष्ण के बाद फिर वहाँ नहीं जाते है । श्रीरामकृष्ण सदा जगन्माता के साथ वार्तालाप करते हैं यह देखकर वे बड़े विस्मित हुए हैं और उनकी सर्वधर्मसमन्वय की बात सुनकर तथा ईश्वर के लिए उनकी व्याकुलता को देखकर वे मुग्ध हो गए हैं ।
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महेन्द्र लगभग दो वर्ष से श्रीरामकृष्ण के पास आया-जाया करते हैं और उनका दर्शन तथा कृपा प्राप्त कर रहे हैं । श्रीरामकृष्ण उन्हें तथा अन्य भक्तों से सदा ही कहते हैं, “ईश्वर निराकार और फिर साकार भी हैं । भक्त के लिए वे देह धारण करते हैं ।” जो लोग निराकारवादी हैं उनसे वे कहते हैं, “तुम्हारा जो विश्वास है उसे ही रखो । परन्तु यह जान लेना कि उनके लिए सभी कुछ सम्भव है । साकार और निराकार ही क्या, वे और भी बहुत कुछ बन सकते हैं ।”
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श्रीरामकृष्ण(महेन्द्र के प्रति)- तुमने तो एक को पकड़ लिया है – निराकार !
महेन्द्र – जी हाँ, परन्तु जैसा कि आप कहते हैं, सभी सम्भव है । साकार भी सम्भव है ।
श्रीरामकृष्ण- बहुत अच्छा, और यह भी जानो कि वे चैतन्य रूप में चराचर विश्व में व्याप्त हैं ।
महेन्द्र- मैं समझता हूँ कि चेतन के भी चेतयिता हैं ।
श्रीरामकृष्ण- अब उसी भाव में रहो । खींचतान करके भाव बदलने की आवश्यकता नहीं है । धीरे धीरे जान सकोगे कि वह चेतनता उन्हीं की चेतनता है । वे ही चैतन्यस्वरूप हैं ।
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“अच्छा, तुम्हारा धन-दौलत पर मोह है ?”
महेंद्र- जी नहीं ! परन्तु हाँ, इतना अवश्य सोचता हूँ कि निश्चिन्त होने के लिए –निश्चिन्त होकर भगवान् का चिन्तन करने के लिए धन की आवश्यकता होती है ।
श्रीरामकृष्ण- वह तो होगी ही !
महेन्द्र- क्या यह लोभ है ? मैं तो ऐसा नहीं समझता ।
श्रीरामकृष्ण- हाँ, ठीक है । नहीं तो तुम्हारे बच्चों को कौन देखेगा ?
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“यदि तुम्हें ‘मैं अकर्ता हूँ’ यह ज्ञान हो जाए तो फिर तुम्हारे लड़कों का क्या होगा ?”
महेन्द्र- सुना है, कर्तव्य का बोध रहते ज्ञान नहीं होता । कर्तव्य मानो प्रखर सूर्य है ।
श्रीरामकृष्ण- अब उसी भाव में रहो । इसके बाद जब यह कर्तव्यबुद्धि स्वयं ही चली जाएगी तब फिर दूसरी बात है । सभी थोड़ी देर चुप रहे ।
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महेन्द्र- केवल थोड़ा ही ज्ञानलाभ होने से तो संसार और भी कष्टप्रद है । यह तो ऐसा होता है मानो होश सहित मृत्यु । जैसे-हैजा !
श्रीरामकृष्ण- राम ! राम !
सम्भवतः इस कथन से महेन्द्र का तात्पर्य यह है कि मृत्यु के समय होश रहने पर अत्यधिक यन्त्रणा का अनुभव होता है, जैसे हैजे में होता है । थोड़े ज्ञानवाले का सांसारिक जीवन बड़ा दुःखमय होता है; क्योंकि वह यह समझ गया है कि संसार भ्रमात्मक है । अविद्या का संसार मानो दावाग्नि के सदृश है । सम्भव इसीलिए श्रीरामकृष्ण ‘राम ! राम !’ कह रहे हैं !
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महेन्द्र- और दूसरी श्रेणी के लोग, जो पूर्ण अज्ञानी हैं, वे मानो मियादी बुखार से पीड़ित हैं । वे मृत्यु के समय बेहोश हो जाते हैं और इससे उन्हें मृत्यु की यन्त्रणा का अनुभव नहीं होता ।
श्रीरामकृष्ण- देखो न, धन रहने से भी क्या ! जयगोपाल सेन कितने धनी हैं, परन्तु हैं दुःखी, लड़के उन्हें उतना नहीं मानते ।
महेन्द्र- संसार में क्या केवल निर्धनता ही दुःख है ? अतिरिक्त छः रिपु भी हैं और फिर उनके ऊपर रोग-शोक ।
श्रीरामकृष्ण- फिर मान-मर्यादा, लोकमान्य बनने की इच्छा ।
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“अच्छा, मेरा क्या भाव है ?”
महेन्द्र- नींद खुल जाने पर मनुष्य का जी भाव होता है वही । उसे स्वयं का होश आ जाता है । ईश्वर के साथ सदा योग है ।
श्रीरामकृष्ण- तुम मुझे स्वप्न में देखते हो ?
महेन्द्र- हाँ, कई बार !
श्रीरामकृष्ण- कैसा ? कुछ उपदेश देते देखते हो ?
महेन्द्र चुप रह गए ।
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श्रीरामकृष्ण- जब जब मैं तुम्हें शिक्षा देता दिखायी दूँ तो यही समझो कि स्वयं सच्चिदानन्द ही यह कार्य कर रहे हैं ।
इसके बाद महेन्द्र ने स्वप्न में जो कुछ देखा था सभी कह सुनाया । श्रीरामकृष्ण ने मन लगाकर सभी सुना ।
श्रीरामकृष्ण(महेन्द्र के प्रति)- यह सब बहुत अच्छा है । तुम और तर्क-विचार न लाओ ! तुम लोग शाक्त हो ।
(क्रमशः)

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