मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

*कलियुग में वेदमत नहीं*

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*जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ ।*
*नैनहुँ मांही राखिये, दादू आप नशाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*कलियुग में वेदमत नहीं* 
“एक दिन उसने गीतापाठ किया । हठ और दृढ़ता भी ऐसी कि विषयी आदमियों की ओर होकर न पढ़ता था । मेरी ओर होकर उसने पढ़ा । मथुरबाबू भी थे । उनकी ओर पीठ फेरकर पढ़ने लगा । उसी नानकपन्थी साधु ने कहा था, ‘उपाय है नारदीय भक्ति’ ।” 
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मास्टर- वे साधु क्या वेदान्तवादी नहीं हैं ?
श्रीरामकृष्ण- हाँ, वे लोग वेदान्तवादी हैं, परन्तु भक्तिमार्ग भी मानते हैं । बात यह है कि अब कलिकाल में वेदमत नहीं चलता । एक ने कहा था, ‘मैं गायत्री का पुरश्चरण करूँगा ।’ मैंने कहा, ‘क्यों ? – कलि के लिए तो तन्त्रोक्त मत है । क्या तन्त्रोक्त मत से पुरश्चरण नहीं होता ?’
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“वैदिक कर्म बड़ा कठिन है । तिस पर फिर दासत्व करना । ऐसा भी लिखा है कि बारह साल या इसी तरह कुछ दिन दासता करते रहने पर मनुष्य दास ही बन जाता है । इतने दिनों तक जिनकी दासता की, उन्हीं की सत्ता उसमें आ जाती है । उनका रज, तम, जीवहिंसा, विलास, ये सब आ जाते हैं-उनकी सेवा करते हुए । केवल दासता ही नहीं, ऊपर से पेन्शन भी खाता है ! 
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“एक वेदान्ती साधु आया था । मेघ देखकर नाचता था । आँधी और पानी देखकर उसे बड़ा आनन्द मिलता था । उसके ध्यान के समय अगर कोई उसके पास जाता था तो वह बहुत नाराज होता था । एक दिन मैं गया । जाने पर वह बहुत ही उकताया । वह सदा विचार करता था, ‘ब्रह्म सत्य हैं, संसार मिथ्या ।’ 
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माया के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं, इसी विचार से वह रोशनी के झाड़ की कलम लिए फिरता था । झाड़ की कलम से देखो तो कितने ही रंग दीख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में रंग कोई भी नहीं है । उसी तरह ब्रह्म के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं, परन्तु माया और अहंकार के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं । किसी चीज को वह एक बार से अधिक न देखता था, जिससे कहीं माया न लग जाय आसक्ति न हो जाय । नहाते समय पक्षी को उड़ते हुए देखकर वह विचार करता था । हम दोनों एक साथ जंगल जाते थे ।
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उसने जब यह सुना कि तालाब मुसलमानों का है तब उसमें से जल नहीं लिया । हलधारी ने उससे व्याकरण के प्रश्न किए; वह व्याकरण जानता था । व्यंजनवर्णों की बात हुई । तीन दिन यहाँ ठहरा था । एक दिन गंगाजी के किनारे पर शहनाई की आवाज सुनकर उसने कहा, जिसे ब्रह्मदर्शन होता है उसे इस तरह की आवाज सुनकर समाधि हो जाती है ।” 
(क्रमशः)

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