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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*८. लै कौ अंग ~ ४५/४८*
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कहन सुनन कूं सबद है, जब लगि तन मंहि सांस ।
सांस बिलै तन ब्रह्म हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥४५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का नाम जब तक देह में सांस है तभी तक है, कहा है सांस छूटने पर सब प्रभु का हो जाता है ।
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जब लग बाणी विसतरै, तब लग उतपति आस ।
सबद सुन्नि सोइ रांम है, सु कहि जगजीवनदास ॥४६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब तक वाणी का विस्तार है तब तक इससे कुछ अच्छा होगा यह आशा रहती है शून्य शब्द ही प्रभु नाम है ।
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द्रव्य सक्ति२ दुनियां रजै, तपा सकति तप आस ।
जोग सक्ति जोगेस्वर३, सु कहि जगजीवनदास ॥४७॥
{२. द्रव्यसक्ति=अर्थशक्ति(=रुपया पैसा) से}
(३. जोगसरा=योगीस्वर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि धन की शक्ति से दुनिया प्रसन्न रहती है जिन्हें तप से आशा है वे तप से खुश रहते हैं जो योगी है वे योग शक्ति से प्रसन्न रहते हैं ।
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ग्यांन सक्ति ग्यांनी मगन, ध्यांन सक्ति मुनि बास ।
नांम सक्ति हरि भगति रस, सु कहि जगजीवनदास ॥४८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ज्ञान के वैभव से ज्ञानी प्रसन्न रहते हैं । ध्यान से मुनि जन, स्मरण से हरि भक्त खुश रहते हैं । ऐसा संत कहते हैं ।
(क्रमशः)

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