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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*दादू औगुण गुण कर माने गुरु के, सोई शिष्य सुजाण ।*
*सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *शिष्य*
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एक गुरु और शिष्य मध्यान्ह में एक बट वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे । शिष्य नींद में था, गुरु जागते थे ।
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दौड़ते हुवे एक काले सर्प को शिष्य की ओर आता देख कर गुरु उसे रोककर बोले - भाई ! आगे कहाँ जाता है ? सर्प - तुम्हारे शिष्य ने पूर्वजन्म में मेरे कण्ठ का रक्त पीया था । इसलिये मैं भी इसके कण्ठ स्थान में काटकर इसका रक्त पीऊंगा ।
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संत - तेरा बदला तो कण्ठ का रक्त पीने का ही है और तो कुछ नहीं न ? सर्प - हाँ, अन्य कुछ नहीं। संत - अच्छा ठहर मैं तुझे इसके कण्ठ का रक्त निकाल कर देता हूँ ।
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संत ने चाकू निकाला और शिष्य की छाती पर बैठकर चीरा देने लगे । शिष्य जग गया और गुरु को अपना कण्ठ काटते देखा तथा यह सोच कर कि गुरु कर रहे हैं सो अवश्य मेरा हित ही होगा, पीछे नेत्र बंद करके ज्यों का त्यों सोता रहा । गुरु ने उसके कण्ठ में चीरा दिया और थोड़ा सा रक्त एक पत्ते पर रख सर्प को पिला दिया, सर्प चला गया ।
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दो चार दिन बाद किसी प्रसंग वश शिष्य से पूछा - जब मैं तेरे कण्ठ को चीरा लगाने लगा तब तुझे क्रोध क्यों नहीं आया ? शिष्य - क्रोध तो अनहित करने पर आता है, मैंने तो उस समय यही सोचा था कि गुरुजी जो कुछ कर रहे हैं उसमें मेरा हित ही होगा । यह सुनकर गुरु ने भी सर्प के बदले की कथा सुना दी ।
शिष्यन का गुरु देव पर, अटल होत विश्वास ।
कंठ काटते देख भी, माना नहिं लव त्रास ॥५०॥

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