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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*दादू पीव का नाम ले, तो मिटै सिर साल ।*
*घड़ी मुहूरत चालनां, कैसी आवै कालि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *कर्म*
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पंजाब प्रान्त के फरीदकोट नामक गांव में, दो ब्राह्मण मित्र थे । एक दिन वे एक बगीची में गये थे । वहां एक ज्योतिषी ने इनके हाथ देखकर कहा - तुम दोनों अमुक दिन एक ही समय में मर जाओगे । फिर दोनों मित्र घर को चले, मार्ग में एक ने कहा कि - संत धनीरामजी के पास चलें । दूसरा संतों से प्रेम नहीं रखता था । उसने कहा - वे क्या बचा देंगे । मृत्यु है तो हो जायेगी । ऐसा कह कर घर चला गया ।
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दूसरा संत के पास गया और उपर्युक्त कथा सुनायी । संत - भाई मृत्यु तो आगे पिछे सभी की होगी । ब्राह्मण - भगवन्, मैं अभी नहीं मरना चाहता । संत - मरना कौन चाहता है ? ब्राह्मण - यह तो ठीक है किंतु कुछ ईश्वर भजन करके मरता तो ठीक था । संत - भजन करना चाहता है तो हमारे यहाँ बैठकर विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करना आरंम्भ कर दे, शरीर की क्रिया को छोड़ रात दिन करता रह, नहीं मरेगा ।
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ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया यह बात नगर में फैल गई । मृत्यु के दिन महाराज के आश्रम पर भारी मात्रा में जनता आ गई । मृत्यु बताने वाला ज्योतिषी भी आ गया । मृत्यु के समय ब्राह्मण विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ कर रहा था । उसके शरीर में सहसा भारी कंप हुआ । उसी समय संत धनीरामजी ने उच्च स्वर दादूराम उच्चारण किया, ब्राह्मण बच गया । उसी समय इसके मित्र की मृत्यु घर पर हो गई । ज्योतिषी ने खड़े होकर कहा - मेरी बात मिथ्या न थी, देखो इसका मित्र मर गया है । किंतु यह नाम प्रताप से तथा संत कृपा से बच गया ।
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नाम जपन से भी बढत, आयु संशय नांहि ।
बढी विप्र की नाम से, फरीदकोट के मांहि ॥११॥

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