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*अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥*
*चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये ।*
*वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १६५)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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परिच्छेद ५८
*सिंदुरियापाटी में ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश*
(१)
*समाधि में*
कार्तिक की कृष्णा एकादशी है, सोमवार, २६ नवम्बर १८८३ ईं. । श्री मणिलाल मल्लिक के मकान में सिन्दुरिया-पट्टी ब्राह्मसमाज का अधिवेशन हुआ करता है । मकान चितपुर रास्ते पर है । समाज का अधिवेशन राजपथ के पास ही दुमँझले के सभागृह में हुआ करता है । आज समाज की वार्षिकी है; इसीलिए मणिलाल महोत्सव मना रहा हैं ।
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उपासनागृह आज आनन्दपूर्ण है, बाहर और भीतर हरे हरे पल्लवों, नाना प्रकार के फूलों और पुष्पमालाओं से सुशोभित हो रहा है । कमरे में भक्तगण बैठे हुए उपासना कब शुरू होगी इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । कमरे के भीतर सब को जगह नहीं मिल पायी है, कई लोग पश्चिम ओरवाले छत पर टहल रहे हैं या जगह जगह पर रखी सुन्दर कुर्सियों पर बैठे हैं । बीच बीच में गृहस्वामी तथा उनके स्वजन आकर मधुर शब्दों से अभ्यागत भक्तों का स्वागत कर रहे हैं । शाम के पहले से ही ब्राह्मभक्तगण आने लगे हैं ।
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उन्हें आज एक विशेष उत्साह है – वहाँ आज श्रीरामकृष्णदेव का शुभागमन होगा । केशव, विजय, शिवनाथ आदि ब्राह्मसमाज के भक्त नेताओं को श्रीरामकृष्णदेव बहुत प्यार करते थे । यही कारण है कि ब्राह्मभक्तों के वे इतने प्यारे हो गए थे । वे भगवत्प्रेम में मस्त रहते हैं; उनका प्रेम, उनका प्रांजल विश्वास, ईश्वर के साथ बालक की तरह उनकी बातचीत, ईश्वर के लिए उनका व्याकुल होकर रोना, माता मानकर स्त्री-जाति की पूजा, उनका विषयप्रसंग-वर्जन, तैलधारावत् सदा ही ईश्वर-प्रसंग करते रहना, उनका सर्वधर्म-समन्वय और अन्य धर्मों के प्रति लेशमात्र भी द्वेषभाव का न रहना, भगवद्भक्तों के लिए उनका रोना, इन सब कारणों से ब्राह्मभक्तों का चित्त उनकी ओर आकर्षित हो चुका था; इसीलिए आज कितने ही भक्त बहुत दूर से उनके दर्शन के लिए आए हुए हैं ।
(क्रमशः)

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