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🦚 #श्रीसंतगुणसागरामृत०२ 🦚
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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ४०/४२)
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*संतों के पद बन्दना से पाप मिटते हैं*
*पद वंदत अघ ना रहै, मिटै सकल तकसीर (पाप) ।*
*ज्ञान सुनत ही मुक्तिमय, टूटे कर्म जंजीर ॥४०॥*
संतों की चरण वंदना व सेवा करने से संतों से ज्ञान सुनकर उसके अनुसार चलने से जीव के सभी प्रकार के कर्मों के बन्धन जंजीर टूट जाती है एवं सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४०॥
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*जप, तप, करणी, दान, पुन तीरथ व्रत अनेक ।*
*ब्रह्मा, इन्द्र देव सब संगति फल पल एक ॥४१॥*
किसी मंत्र का जाप हठ योग के तप, दान, पुण्य, सत्कर्म, अनेक तीर्थाटन व निवास, चन्द्रायण आदि अनेक व्रत, ब्रह्मा इन्द्र आदि व भैरूंजी आदि देवों की साधना पूजा आदि सभी कार्य मिलकर भी एक पल साधु संत संगति के फल के समान नहीं होते अर्थात् संत संगति का फल अधिक है ॥४१॥
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*वेदशास्त्र पुराण सब, निश्चै पढै जु कोई ।*
*संत संगति पल एक में ऊपजै अनुभव सोई ॥४२॥*
चारुं वेद, अठारह पुराण एवं षट् शास्त्र आदि सभी एक निश्चय के साथ कोई पढले उससे जो ज्ञान प्राप्त होता है वह संतों के साथ एक पल का सत्संग करने से ज्ञान व अनुभव दोनों की प्राप्ति होती है ॥४२॥
(क्रमशः)

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