शनिवार, 7 नवंबर 2020

= १७३ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ ।*
*कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्कर्मी पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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एक गांव के पास एक नदी थी । नदी के पार एक संत रहा करते थे । गांव से एक वैश्य और कोली प्रतिदिन संत के पास जाते थे । वैश्य प्रणाम करता तथा उचित सेवा भी करता । कोली दूर खड़ा रहकर खूब गालियां देता था । बर्षा काल आया । एक दिन नदी का पानी बहुत चढ गया ।
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वैश्य समय पर संत के पास न जा सका । किंतु कोली जैसे तैसे नदी पार करके समय पर संत के पास पहुँचा और खुब गालियां दी संत उसके नियम को दृढ़ देखकर प्रसन्न होकर बोले - जो तेरी इच्छा हो सो मांग ले । कोली वस्त्र बनाने का काम करता था । उसने यह सोचकर कि- एक सिर और दो भुजा पीठ की और हो जाय तो दुगना काम करूंगा । पीठ की और दो भुजा और एक सिर मांग लिया । संत समर्थ थे उनने वैसा ही वर दे दिया । तत्काल दो भुजा और सिर पीठ में आ गये । वह प्रसन्न हो नदी पार करके गांव की ओर जाने लगा । तब सामने के गांव के नवयुवकों ने उसे राक्षस जानकर पत्थरादि से मार डाला और वैश्य की उन्नति हुई ।
कर्म तुल्य ही फल मिले, यदि प्रसन्न हो कोय ।
वैश्य बचा कोली मरा, नियम निवाह दोय ॥१५

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