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*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*अवतार-पुरुष में ईश्वर का दर्शन । अवतार चैतन्यदेव*
“वैष्णव-ग्रन्थ में कहा है, विश्वास से कृष्ण मिलते हैं, वे तर्क से बहुत दूर हैं ।’ केवल विश्वास !
“कृष्णकिशोर का क्या ही विश्वास है ! वृन्दावन में कुएँ से एक नीच जाति के पुरुष ने जल निकाला; कृष्णकिशोर ने उससे कहा, ‘तू बोल शिव;’ उसके शिवनाम लेते ही उसने जल पी लिया । वह कहता था, ‘ईश्वर का नाम लिया है, फिर भी धन आदि खर्च करके प्रायश्चित्त करना होगा ? कैसी विडम्बना है !’
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“कृष्णकिशोर यह देख कर आश्चर्यचकित हो गया कि लोग अपने शारीरिक रोगों से छूटकर पानेके लिए भगवान् को तुलसीदल चढ़ा रहे हैं ।
“साधुदर्शन की बात पर हलधारी ने कहा था, ‘और क्या देखने जाऊँ-पंचभूतों का पिंजरा !’ कृष्णकिशोर ने क्रुद्ध होकर कहा, ‘ऐसी बात हलधारी ने कही है !’ क्या वह नहीं जानता कि साधुओं की देह चिन्मय होती है !’
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“कालीबाड़ी के घाट पर हमसे कहा था, ‘तुम लोग आशीर्वाद दो कि राम राम कहते मेरे दिन कट जाएँ !’
“मैं कृष्णकिशोर के मकान पर जब जाता था, तब मुझे देखते ही वह नाचने लगता था !”
“श्रीरामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा था, ‘भाई, जहाँ पर उर्जित भक्ति देखोगे, जानो कि वहीँ पर मैं हूँ ।’
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“जैसे चैतन्यदेव; प्रेम से हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं । चैतन्यदेव अवतार हैं- उनके रूप में ईश्वर अवतीर्ण हुए हैं ।
श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं- (भावार्थ) – “भावनिधि श्रीगौरांग का भाव तो होगा ही रे’ वे भावविभोर होकर हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं’ सिसक-सिसककर रोते हैं ।”
(क्रमशः)

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