🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ ।*
*कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्कामी पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *कर्म*
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एक फकीर मेवा खाने काबुल गया, वहां भारतवासी किसी मुसलमान के यहाँ ठहरा । वे प्राय: अपना देशी खाना खाते थे । अपने देशी भाई को भी वही जौ की रोटी और प्याज ही देने लगे । फकीर भारत में प्राय: प्याज के साथ ही रोटी ही खाता था । वही आगे भी मिला । इससे ज्ञात होता है कि अपना कर्म अपने साथ ही रहता है ।
निजी कर्म निज संग रहे, इसमें संशय नांहि ।
काबुल कांदा रोटि ही, आई थाली मांहि ॥१७॥

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