🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४०२ - *हितोपदेश* । खेमटाताल
हाजिराँ१ हजेर२ साँई,
है हरि नेड़ा दूर नाँहीं ॥टेक॥
मनी३ मेट महल में पावै,
काहे खोजन दूरा जावे ॥१॥
हिर्स४ न होइ गुस्सा सब खाइ,
तातैं सँइयाँ दूर न जाइ ॥२॥
दूई५ दूर दरोग६ न होइ,
मालिक मन में देखै सोइ ॥३॥
अरि ये पँच शोध सब मारै,
तब दादू देखै निकट विचारे ॥४॥
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४०२ - ४०३ में हित का उपदेश कर रहे हैं - हम प्रभु के निकट२ ही उपस्थित१ हैं, वे हरि व्यापक होने से समीप ही हैं, दूर नहीं है ।
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अभिमान३ को मिटा, फिर तो हृदय - महल में ही वे मिल जांयेगे । उनको खोजने के लिये दूर क्यों जाता है ?
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सँत - जनों में भोगों का लोभ४ नहीं होता और वे सँपूर्ण क्रोध को नष्ट कर देते हैं इसी से परमात्मा उनसे दूर नहीं जाते ।
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जिसका द्वैत५ भाव दूर हो गया और जिससे मिथ्या व्यवहार नहीं होता वह परमात्मा को अपने हृदय में ही देखता है ।
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ये जो पँच ज्ञानेन्द्रिय और काम, क्रोधादि शत्रु हैं, इन सबको जो खोज कर मारता है, वही विचार द्वारा प्रभु को निकट देखता है ।
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(क्रमशः)

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