🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४०३ - खेमटा ताल
राम रमत देखै नहिं कोई,
जो देखै सो पावन होई ॥टेक॥
बाहर भीतर नेड़ा न दूर,
स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥१॥
जहं देखूँ तहं दूसर नांहिं,
सब घट राम समाना मांहिं॥२॥
जहां जाऊँ तहं सोई साथ,
पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥३॥
दादू हरि देखैं सुख होइ,
निश दिन निरखन दीजै मोहि ॥४॥
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राम तो सब में रम रहे हैं, किन्तु कोई भी उनको देखता नहीं और जो उनको व्यापक रूप से देखता है, वह पवित्र होकर अन्य को भी पवित्र करने वाला हो जाता है ।
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उन प्रभु को बाहर - भीतर, समीप वो दूर नहीं कह सकते, वे सब में परिपूर्ण हो रहे हैं ।
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मैं तो जहां भी देखता हूं वहां अन्य को देखता ही नहीं । सभी घटों में राम समाये हुये हैं ।
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मैं जहां जाता हूं, वहां ही उन्हें साथ देखता हूं, वे त्रिभुवन स्वामी हरि सर्वत्र परिपूर्ण हो रहे हैं ।
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जब हम हरि को देखते हैं, तब आनन्द होता है । हे प्रभो ! आप अपना स्वरूप मुझे रात्रि दिन प्रतिक्षण देखने दीजिये, मुझ से छिप कर न रहिये ।
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(क्रमशः)

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