मंगलवार, 17 नवंबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(३७/४०)* =

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*तन नहिं भूला, मन नहिं भूला, पंच न भूला प्राण ।*
*साधु सबद क्यूँ भूलिये, रे मन मूढ अजाण ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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मींच विसारी मुग्ध मन, भूला आतम राम ।
रज्जब मूढ करमी यहु, सरै कौन विधि काम ॥३७॥
मूर्ख, मन से मृत्यु को तथा आत्म स्वरूप राम को भूल गया है इसलिये यह मूढकर्मी है, ऐसे मूढ कर्मी का मुक्ति रूप कार्य किस प्रकार सिद्ध होगा ?
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ब्रह्म विछोह वियोग न उपजै, चौरासी आवे नहिं चित्त ।
तो रज्जब तासौं क्या कहिये, महामूढ मंद भागी मित्त१ ॥३८॥
ब्रह्म के विछोह से जिसके चित्त में वियोग व्यथा नहीं उत्पन्न होती और न चौरासी में भ्रमण का क्लेश ही जिसके चित्त में आता है, हे मित्र१ ! तब उससे क्या कहैं वह तो महा मूढ और मन्द भागी है ।
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ऊषर खित१ वपु बाँझ के, बीज नहीं परकाश२ ।
त्यों रज्जब शिष शठों में, शब्द शुद्ध का नाश ॥३९॥
उषर पृथ्वी१ में बीज नहीं उगता और बाँझ के शरीर में वीर्य पुत्र रूप से प्रकट२ नहीं होता, वैसे ही मूर्ख शिष्यों में शुद्ध शब्द भी नष्ट हो जाते हैं, उनसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता ।
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शुद्ध शब्द शत१ खण्ड२ व्हैं, शठ श्रोता में आय ।
रज्जब मद३ भाजन परसि४, खीर५ ख्वार६ व्है जाय ॥४०॥
जैसे मद्य३ के बर्तन में डालने४ से दूध५ फट६ कर उसके टुकड़े हो जाते हैं, वैसे ही मूर्ख श्रोता के अन्त:करण में आकर शुद्ध शब्दों के भी सैंकड़ों १ टुकड़े २ हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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