बुधवार, 18 नवंबर 2020

*आय रु गोद लियो दृग नीरन*

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*सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव ।*
*दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निंदा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
*जटायु की पद्य टीका* 
*रावण सीत हिं जात हरे खग,*
*राज सुन्यो स्वर दौरत आयो ।*
*राड़ करी तन वारि हरी पर,*
*प्राण रखे प्रभु देखन भायो ॥*
*आय रु गोद लियो दृग नीरन,*
*सींचत बात कही रु जरायो ।*
*मान कर्यो दशरत्थ समा,*
*जल-दान दियो पुनि धाम पठायो ॥३९॥*
रावण सीताजी को पंचवटी से हर कर लंका की ओर ले जा रहा था, खगराज जटायु ने उसी समय सीताजी का दुःख पूर्ण शब्द सुना और दौड़ते हुये उनकी रक्षा के लिये आ गये अपने शरीर को हरि के समर्पण करके अपनी शक्ति भर रावण से युद्ध किया । अंत में पंख कट जाने से घायल हो कर मृत्यु की दशा को प्राप्त हो गये । किन्तु भगवान् राम के दर्शन करने की इच्छा थी इसलिये प्राणों को शरीर में रोके हुये थे । 
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फिर रामजी वहां आये और जटायु को पहचान कर उनकी ग्रीवा गोद में लेकर अपने नेत्रों के अश्रु जल से उसे सींचने लगे तथा जीवित करने की बात भी कही । किन्तु जटायु ने कहा-अंत समय आपका दर्शन हो रहा है ऐसे अच्छे मृत्यु के समय का अनादर मैं नहीं करूंगा । फिर भगवान् राम ने अपने पिता दशरथ के समान जटायु का सन्मान करके देह का दाह संस्कार किया और जल-दानादि क्रिया करके अपने परमधाम में भेज दिया ।
(क्रमशः)

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