मंगलवार, 3 नवंबर 2020

= १६५ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*शूरा झूझै खेत में, सांई सन्मुख आइ ।*
*शूरे को सांई मिले, तब दादू काल न खाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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जयपुर राज्य पर एक भेडेज नामक शत्रु ने चढाई की थी, खाटू गांव के पास उसे रोकने के लिये दादूपंथ नागों की सेना पड़ी थी । रक्षापूर्णिमा का दिन था, सब नागे शस्त्र रहित पूजा में बैठे थे । शत्रु ने धोखे से उन पर हमला बोल दिया । बहुत मात्रा में नागे मारे गये ।
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उस समय नागों के महन्त मंगलदासजी ने अपने हाथों अपना शिर उतार कर थाल में रखा और शत्रु सेना में प्रवेश किया । यह देख डोंगरियों के ठाकुर चूड़सिंह की पत्नी ने अपने पति से कहा - आपके गुरु तो शिर उतार कबन्ध बनकर शत्रुसेना को काट रहे आप क्या देख रहे है ?
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ठाकुर ने कहा - शत्रु सेना विशाल है, इससे विजय पाना कठिन है, व्यर्थ मरने से क्या लाभ ? उसने कहा - अपना मरदाना भेष मुझे दे दें मैं गुरु स्वामी जी का अनुसरण करूंगी । यह सुन कर ठाकुर चूड़सिंह ने भी गुरु के समान ही शिर उतार कर शत्रु सेना में प्रवेश किया ।
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दोनों वीरों ने शत्रु सेना को काट डाला और सेनापति के हाथी पर मारने लगे तब उनके शरीरों पर नील के छींटे लगाये गये उनसे उन वीरों के देह पृथ्वी पर गिर पड़े किंतु शत्रु भाग गया और इनकी विजय हो गई । इससे सूचित होता है कि वीरों को प्राणों का लोभ नहीं होता ।
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प्राण लोभ होता नहीं, वीरों को लव लेश ।
मंगलदास रु चूड़ सिंह, शीश तजे अक्लेश ॥८०

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