🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९७ - *निन्दा*। त्रिताल
https://youtu.be/p2tEUxiBIN8
निन्दत है सब लोक विचारा,
हमको भावै राम पियारा ॥टेक॥
निस्सँशय निर्दोष लभावै,
तातैं मोकौं अचरज आये ॥१॥
दूविधा द्वै पख रहिता जे,
तासन कहत गये रे ये ॥२॥
निर्वैरी निष्कामी साध,
ता शिर देत बहुत अपराध ॥३॥
लोहा कंचन एक समान,
ता सन कहत करत अभिमान ॥४॥
निन्दा औ स्तुति एकै तोलै,
ता सन कहैं अपवाद हि बोलै ॥५॥
दादू निन्दा ताको भावै,
जाके हिरदै राम न आवै ॥६॥
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राम भक्ति रहित लोगों को ही परनिन्दा प्रिय होती है, यह कह रहे हैं - कल्याण साधन से हीन बेचारे लोग हमारी राम - भक्ति की निन्दा करते हैं, किन्तु हम को तो राम ही प्रिय है ।
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ये लोग सँशय रहित, निर्दोष को भी दोष लगाते हैं, इसी से मुझे आश्चर्य होता है ।
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जो ज्ञानी दूविधा मय द्वैत पक्ष से रहित हैं, उनको कहते हैं कि - ये तो उभय लोक से भ्रष्ट हो गये हैं ।
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जो निर्वैरी और निष्कामी सँत हैं, उनके शिर भी बहुत दोष लगाते हैं ।
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जो विरक्त लोह और सुवर्ण को एक - सा समझते हैं उन्हें कहते हैं, ये अभिमान करते हैं ।
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जो निन्दा और स्तुति को एक समान समझते हैं, उन्हें कहते हैं, ये ठीक नहीं कहते ।
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उक्त प्रकार निन्दा करना उसी को अच्छा लगता है, जिसके हृदय में राम चिन्तन द्वारा राम का साक्षात्कार नहीं होता ।
(क्रमशः)

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