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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ७३/७५)
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*चौसठ स्वरूप बढते गया*
*चारि निकाले भये जु आठ,*
*अष्ट दिष्टि तब सोलह ठाठ ।*
*कै सोलह कै बत्तिस भइया,*
*देखत ही चौसठै गया ॥७३॥*
चार स्वरूप को मंदिर से निकाला तो उसी स्थान पर मंदिर में आठ स्वरूप हो गये । आठ को निकाला तो सोलह हो गये । सोलह को मंदिर से बाहर किया तो अन्दर बत्तिस हो गये और उनको निकालते ही देखते देखते चौसठ स्वरूप उसी अवस्था में हो गये ॥७३॥
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*चौसठि से एक सो अठाई,*
*आगे द्वै सौ छप्पन भाई ।*
*अरध सहस्त्र द्वादस(५१२) होई,*
*एक सहस्त्र(१०२४) चौबीस सोई ॥७४॥*
चौसठ को हटाने पर एक सौ अठ्ठारह रूप हो गये, इसके बाद दौ सो छप्पन रूप हो गये । उनको हटाने पर पांच सौ बारह हो गये और फिर एक हजार चौबीस रूप हो गये ॥७४॥
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*श्री दादू जी के स्वरूप ४०९६*
*द्वै सहस्त्र(२०४८) आगे अठताली,*
*चतु: सहस्त्र छियानवे ४०९६ निकाली ।*
*को को पुजारी बहुते स्वामी,*
*कहै राव-‘‘ये अंतरजांमी’’ ॥७५॥*
आगे दो हजार अठतालीस हो गये पश्चात् चार हजार छियानवे रूप हो गये । कौन कौन पुजारी है स्वामी के बहुत रूप हो गये । राव ने कहा ये तो अंतर्यामी भगवान ही हैं ॥७५॥
(क्रमशः)

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