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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*९. निहकर्मी कौ अंग ~ २५/२८*
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रांम हमारे रांम रंग, रांम हमारे रास१० ।
रांम हमारे वासना११, सु कहि जगजीवनदास ॥२५॥
(१०. रास=रासलीला) (११. वासना=कामना)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम ही हमारे राम रंग हैं हमारे रंग का रंग भी राम हैं । राम ही हमारे नृत्य हैं राम की ही हम कामना करते हैं ऐसा संत जगजीवन जी कहते हैं ।
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अस्त१ बस्तु२ मंहि बिलावै, अंदर अगनि प्रकास ।
रांम नांम मंहि ते रंगे, सु कहि जगजीवनदास ॥२६॥
(१. अस्त=अस्थियाँ) (२. बस्तु=परम तत्त्व परमात्मा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो परम तत्व अस्थि के अतंर से भी अग्नि व प्रकाश तक छोड़ दे, वे ही राम के रंग में रंगे हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, तुम क्रित कोटि अनंत ।
मम क्रित मांहै एक रस, क्रम३ तजि परसौं कंत४ ॥२७॥
(३. क्रम=कर्म) (४. परसौं कंत=परमेश्वर का साक्षात्कार)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभो आपके लिये तो अनंत करोड़ कार्य हैं जिन्हें आप करते हैं, मेरे लिये तो राम जी एक ही कार्य है कि मुझे आपका साक्षात्कार हो जाये ।
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कहि जगजीवन बंदना, सब देवन कों होइ ।
परम पुरिष को परसतां, कांनी५ रहे न कोइ ॥२८॥
(५. कांनी=बाकी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब देवों की विनय कर कहते हैं कि उन परम पुरुष को साक्षात्कार करने के पश्चात कुछ भी शेष नहीं रहता है ।
(क्रमशः)

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