मंगलवार, 17 नवंबर 2020

= १८० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं,*
*नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं ।*
*मन स्थिर करि लीजै नाम,*
*दादू कहै तहाँ ही राम ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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ओरछे नरेश मधुकर शाह ने व्यासदासजी को बुलवाने के लिये अपने मंत्री को भेजा था । बहुत यत्न करने पर भी व्यासदासजी ने, वृन्दावन छोड़ कर ओरछा जाना स्वीकार नहीं किया । तब मंत्री ने उनके गुरु हितहरिवंशजी से, एक बार व्यासदासजी को ओरछा जाने के लिये कहा । गुरुजी ने आज्ञा दी और यह भी कहा कि - मैं उन्हे कह दूंगा वे चले जायेंगे ।
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इधर व्यासजी को ज्ञात हुआ कि गुरु मुझे ओरछा भेजेंगे । वे जमुना स्नान को गये थे वहां ही झाऊवन में जा छिपे । तीन दिन तक उनका कोई पता न लगा । गुरु ने शिष्य को खोजने भेजा मिलने पर काला मुख करके और एक गधा साथ लेकर चले । साथियों ने पूछा - काला मुख क्यों किया है ? तथा गधा साथ क्यों लिया ?
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व्यासदासजी - जब मुझे वृन्दवन और गुरु चरणों को छोड़ कर जाना ही पड़ेगा तो ऐसे गमन समय तो काला मुख करके तथा गधे पर बैठकर के ही जाना चाहिये । यह बात जब गुरुजी ने सुनी तब मंत्री को कहला भेजा कि व्यासदास को जाने की आज्ञा मैं नहीं दूंगा ।
गुरु पद तज संसार सुख, चहै न शिष्य सुजान ।
मुख स्याही खर संग लिया, व्यासदास मतिमान ॥३५॥

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