बुधवार, 4 नवंबर 2020

*दक्षिणेश्वर में कार्तिकी पूर्णिमा*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🌷 #श्रीरामकृष्ण०वचनामृत 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचै प्राण ।*
*विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥*
*(श्री दादूवाणी ~लै का अंग)*
================
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
परिच्छेद ५७
*दक्षिणेश्वर में कार्तिकी पूर्णिमा*
(१)
*श्रीरामकृष्ण की अद्भुत स्थिति-नित्य-लीलायोग*
.
आज मंगलवार, १६ अक्टूबर १८८३ ई.। बलराम के पिता दूसरे भक्तों के साथ उपस्थित हैं । बलराम के पिता परम वैष्णव हैं । हाथ में हरिनाम की माला रहती है, सदा जप करते रहते हैं ।
कट्टर वैष्णवगण अन्य सम्प्रदाय के लोगों को उतना पसन्द नहीं करते । बलराम के पिता बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते हैं, उनका उन वैष्णवों का-सा भाव नहीं है ।
.
श्रीरामकृष्ण- जिनका उदार भाव है वे सभी देवताओं को मानते हैं, - कृष्ण, काली, शिव, राम आदि ।
बलराम के पिता- हाँ, जिस प्रकार एक पति, अलग अलग पोशाक में ।
श्रीरामकृष्ण- परन्तु निष्ठाभक्ति एक चीज है । गोपियाँ जब मथुरा में गयीं तो पगड़ी पहने हुए कृष्ण को देखकर उन्होंने घूँघट काढ़ लिया और कहा, ‘यह कौन है ! हमारे पीतवस्त्रधारी, मोहनचूड़ावाले श्रीकृष्ण कहाँ है ?’
.
“हनुमान की भी निष्ठाभक्ति है । द्वापर युग में द्वारका में जब आए तो कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, ‘हनुमान रामरूप न देखने से संतुष्ट न होगा ।’ इसलिए रामरूप में उन्हें दर्शन दिया !
“कौन जाने भाई, मेरी यही एक स्थिति है । मैं केवल नित्य से लीला में उतर आता हूँ और फिर लीला से नित्य में चला जाता हूँ ।
.
“नित्य में पहुँचने का नाम है ब्रह्मज्ञान । बड़ा कठिन है । विषयबुद्धि एकदम नष्ट हुए बिना कुछ नहीं होता । हिमालय के घर जब भगवती ने जन्म लिया तो पिता को अनेक रूपों में दर्शन दिया । हिमालय ने उनसे कहा, ‘मैं ब्रह्मदर्शन की इच्छा करता हूँ ।’ तब भगवती ने कहा, ‘पिताजी, यदि वैसी इच्छा हो तो सत्संग करना पड़ेगा । संसार से अलग होकर बीच बीच में निर्जन में साधुसंग कीजिए ।’
.
उस एक से ही अनेक हुए हैं – नित्य से ही लीला है । एक ऐसी अवस्था जिसमें ‘अनेक’ का बोध नहीं रहता और न ‘एक’ का ही; क्योंकि ‘एक’ के रहते ही ‘अनेक’ आ जाता है । वे तो उपमाओं से रहित हैं – उन्हें उपमा देकर समझाने का उपाय नहीं है ! अन्धकार और प्रकाश के मध्य में हैं । हम जिस प्रकाश को देखते हैं, ब्रह्म वह प्रकाश नहीं है – ब्रह्म यह जड़ आलोक नहीं है ।*(*ब्रह्म यह जड़ आलोक नहीं है 
– “तत् ज्योतिषां ज्योतिः ।” 
“तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यत आत्मविदो विदुः ।” 
– मुण्डक उपनिषद्, २/२/९)
“फिर जब वे मेरे मन की अवस्था को बदल देते हैं – जिस समय लीला में मन को उतार लाते हैं – तब देखता हूँ ईश्वर, माया, जीव, जगत् – वे सब कुछ बने हुए हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें