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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी ।*
*जेती बाबा तैं कही, इन एक न मानी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *नास्तिकता और उससे हानि*
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नास्तिक वृहस्पति का मंडन मिश्र से कई दिन से शास्त्रार्थ होता रहा । नास्तिक वृहस्पति ईश्वर का खण्डन करते थे और मंडन मिश्र मण्डन करते थे, दोनों की समता चली आ रही थी । नास्तिक वृहस्पति यह सोच कर कि - मण्डन को जीतन सहज नहीं अब यहाँ से चलना चाहिये।
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साँझ को मण्डन से मिलने गये थे । दोनों की प्रेम पूर्वक बातें हो रही थी । इतने में ही एक मुनि आये और बोले - आप लोगों की शास्त्र चर्चा में क्या निर्णय निकला ? दोनों ने कहा - कोई निश्चय नहीं हुआ दोनों सम हैं । मुनि - अच्छा, तो चलों विश्वनाथ जी के दर्शन कर आवें ।
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मुनि से प्रभावित होकर दोनों पंडित चल दिये । मंदिर में जाकर मुनि ने तथा मंडन ने तो साष्टांग प्रणाम किया और नास्तिक वृहस्पति खम्भे के समान खड़े थे कि खड़े खड़े ही मूर्छा आ गयी । भयंकर प्यास लगी, नदी बह रही थी, किंतु सामने एक सिंह मुंह फाड़े खाने आ रहा था ।
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यह देखकर नास्तिक वृहस्पति के मुख से सहसा निकल पड़ा कि हे ईश्वर रक्षा कर । इतना कहते ही सिंह भाग गया, नदी पर जाकर जल पीया, मूर्छा खुली तो मंदिर में खड़े हैं । फिर मुनि और मिश्र से कहा - आज मुझे ईश्वर सत्ता का ठीक ठीक ज्ञान हो गया है । अब मैं कलाप गांव को जाता हूँ और अपने शेष जीवन में ईश्वर भजन करूंगा अन्य कुछ नहीं । फिर उन्होने वैसा ही किया ।
संत जनों के संग से, नास्तिकता झट जाय ।
बदले नास्तिक वृहस्पति, मुनी की संगत पाय ॥२७९॥

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