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*अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार ।*
*जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निंदा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सोच करैं ऋषि आश्रम में सब,*
*नीर बिगाड़ सह्यो नहीं जावै ।*
*आवत राम सुने वन मारग,*
*जाय सबै उन भेद सुनावै ॥*
*आय विराज रहे शबरी-गृह,*
*मान मर्यो सुनके दुख पावै ।*
*जाय परे पग तोय करो शुचि,*
*पाँव गहो भिलनी शुध भावै ॥३८॥*
इधर आश्रम में सभी ऋषि जन जल बिगड़ने की चिन्ता में निमग्न होकर विचार कर रहे थे, क्या किया जाय; जल का बिगड़ना तो सहन नहीं हो रहा है । तब किसी ने सुनाया-इस वन के मार्ग से भगवान् राम आ रहे हैं ऐसा सुनते हैं । सो सब उनके पास जाकर जल के बिगड़ने का रहस्य उनको सुनावें और उन्हीं से शुद्ध होने का उपाय भी पूछैं, वे ठीक ही बतलायेंगे ।
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इतने में ही किसी ने आकर सुनाया-रामजी तो आ गए हैं और शबरी की कुटिया पर विराज रहे हैं । यह सुन का उन ऋषियों का अभिमान नष्ट हो गया और आश्रम में राम नहीं आये इससे दुःख भी हुआ । अब निरभिमान होकर सभी शबरी की कुटिया पर ही गये । रामजी को प्रणामादि करने के बाद प्रार्थना कि-हमारे यहाँ का जल बिगड़ गया है, आप कृपा करके उसे पवित्र करें ।
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तब रामजी ने कहा-वह शबरी का अपमान करने से बिगड़ा है, अब आप उसे शुद्ध कराना चाहते हैं तो शबरी के ही चरण ग्रहण करो तथा इसके चरणों का जल से स्पर्श कराओ, अवश्य शुद्ध हो जायगा । ऋषियों ने रामजी के कथनानुसार ही किया, उससे जल बहुत सुन्दर बन गया ।
“अधिक बढ़ावत आपतें, जन महिमा रघुवीर ।
शबरी पद रज परसतां, शुचि भयो सरिता नीर ।”
फिर शबरी ने रामजी के सामने ही अपना देह त्याग कर परम धाम को प्राप्त कर लिया । भक्ति की महिमा ऐसी ही है ।
(क्रमशः)

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