🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
*कोटि वर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास ।*
*दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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हनुमंत हाँक सुणि ना भया, जत१ जुवातिनि२ के डील३ ।
जन रज्जब धन्य साधु सो, जो उन्हें उपावे४ शील५ ॥३३॥
हनुमान की हाँक सुनकर भी नारियों२ के शरीर३ में काम रहित होने का साधन१ उत्पन्न नहीं हुआ, उन नारियों में जो शीलव्रत५ उत्पन्न४ करदे वह साधु धन्यवाद के योग्य है ।
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हीरा मिश्री मोती बाइक१, फटक२ बंस तग३ धूत४ ।
रज्जब रंग५ रस मुक्त मन, जड पोला तुच६ पूत७ ॥३४॥
हीरा का रंग५ वा हीरी के पास जाने का प्रेम५, मिश्री का मधुर रस, मोती का मुक्त पना, वचन१ का मन से सम्बंध, बिल्लौर२ पत्थर की जड़ता, बांस का पोलापन और तागे३ की तुच्छता६ ये सब दूर नहीं होते, वैसे ही मूढ धूर्त४ की धूर्तता रूप दुर्गन्ध७ दूर नहीं होती, उसका असाध्य रोग है ।
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मनिष१ मीन जगदीश जल, मुख पीवहि नहिं माँहिं ।
सो रज्जब जाणे सु क्यों, सुकृत शोणित२ नाँहिं ॥३५॥
मच्छी जल में रहती है किन्तु मुख से जल पीना नहीं जानती कारण उसमें रक्त२ ही नहीं है तब मुख से पीना कैसे जाने ? वैसे ही मनुष्य१ जगदीश्वर व्यापक ब्रह्म में ही रहते हैं किन्तु जिसमें सुकृत नहीं होता वह उसे कैसे जाने, उस मूढ के तो कुकर्म रूप असाध्य रोग लगा है ।
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जप तप कसण्यों१ माँही कोरा२, थाके विविधि विवेक ।
रज्जब रहे वेद विधि बाइक, मन मनमानी नहिं एक ॥३६॥
जप जपादि के कष्टों१ में संलग्न रहकर भी मूढ प्राणी ब्रह्म तत्व से वंचित२ ही रह जाता है उसके नाना प्रकार के विवेक ज्ञान थक जाते हैं ब्रह्म तत्व का बोध नहीं करा पाते, वेद के विधि-विधान और वचन भी ब्रह्म साक्षात्कार रूप कार्य में अधूरे ही रह जाते हैं, कारण - उनके मन में न मानना रूप असाध्य रोग लगा रहता है इससे उसका मन एक भी नहीं मानता अर्थात धारण नहीं करता, केवल बोलकर अन्यों को ही सुनाता है ।
(क्रमशः)

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